ID SENT ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0001 Unnat-Kirshi-Taknik-Link11: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0003 धान की सीधी बुआई कम लागत में अधिक उत्पादन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0005 सही विधि एवं सही समय से बुआई ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0007 धन की सीधी बुआई संसाधन संरक्षित खेती की एक तकनीक है, जिससे 20 प्रतिशत जल तथा श्रम की बचत होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0008 पूर्व में धान की सीधी बुआई की तकनीकी में सफलता नहीं मिल पा रही थी, जिसका मुख्य कारण सही सीड ड्रिल एवं उपयोगी खरपतवारनाशियों की अनुपलब्धता थी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0009 वर्तमान समय में धान की सीधी बुआई के लिए कई मशीनें उपलब्ध हैं एवं व्यापक खरपतवार प्रबंधन की तकनीकें भी उपलब्ध हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0010 इस तकनीक की सफलता के लिए सही विधि एवं सही समय से बुआई करनी चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0011 इस तकनीक से मिट्‌टी के स्वास्थ्य में सुधार के साथ उत्पादन लागत घटाते हुए किसान अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0013 धान की अच्छी फसल के लिए बीज दर, बीज की गहराई, बुआई का समय, बीजोपचार एवं खरपतवार नियंत्रण इत्यादि क्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0014 इससे अधिक उपज के साथ धन, जल एवं श्रमिकों की बचत होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0015 सीड ड्रिल द्वारा धान की सीधी बुआई में पलेवा एवं खेत की तैयारी में लगने वाले समय की बचत होती है एवं धान की फसल 10 से 15 दिनों पहले ही तैयार हो जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0019 धान की सीधी बुआई के लिए लेजर लेवलर द्वारा भूमि का समतलीकरण करना आवश्यक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0020 यह बीज की समान गहराई, फसल के अच्छे जमाव, विकास, खरपतवार नियंत्रण एवं जल के एक समान वितरण के लिए जरूरी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0022 बीज दर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0024 प्लान्टर द्वारा बुआई करने पर मध्यम प्रकार के दानों के लिए बीज दर 15-20 कि.ग्रा./हैक्टर तथा बड़े दानों के लिए बीज दर 20-25 कि.ग्रा./हैक्टर रखें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0026 बीज की गहराई ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0028 धान की सीधी बुआई में बीज की गहराई महत्वपूर्ण है,बीज की गहराई 2-3 सें.मी. रखें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0029 अधिक गहरी या उथली बुआई से जमाव प्रभावित होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0030 अधिकतर ड्रिल मशीन या प्लान्टर में बीज नियंत्रक पहिया होता है, जिसके द्वारा बीज की गहराई को समायोजित किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0031 बुआई करके पाटा लगाएं, जिससे नमी संरक्षित रह सके और बीज का अच्छा जमाव हो सके। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0033 सही किस्मों का चयन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0035 सही किस्मों का चयन ऐसे प्रभेद जिनकी शुरुआती बढ़वार तीव्र गति से हो, गहरी जड़ें हों तथा जिनको पानी की आवश्यकता कम हो। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0037 धान की किस्में ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0039 जेआर 201, पूसा सुंगधा 3, पूसा सुंगधा 5, क्रांति, सोनम, पूसा बासमती, एमटीयू 1010, तुलसी, वंदना, पंत 4, एमआर 219, डब्ल्यूजीएल 32100, जेजीएल 3844, एचएमटी, शबनम, गोविंदा, दुबराज, विष्णुभोग। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0041 हाइब्रिड धान की किस्में ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0043 एनपीएच 567, एनपीएच 207, एसबीएच 999, , बायर 6129 , बायर 158, जेआरएच-5, एनपीएच 207, प्रो एग्रो-6201, पी ए 6444, पीएचबी 71। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0045 खेत की तैयारी एवं बुआई ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0047 अगर पूर्व फसल के खरपतवार हैं तो ग्लाइफोसेट खरपतवारनाशक का छिड़काव करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0048 1.5 लीटर मात्रा को 100 लीटर पानी में मिलाकर 1 एकड़ में प्रयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0049 ग्लाइफोसेट छिड़काव से पहले ध्यान रखें कि उपयोग किए जाने वाला पानी बिलकुल साफ हो तथा फ्लैट-फैन नोजल का उपयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0050 ग्लाइफोसेट के साथ 2,4-डी 2 मि.ली./लीटर पानी में मिलाने पर खरपतवार का अच्छा नियंत्रण होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0052 बुआई की तकनीकी ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0054 खेत में बीजों की सटीक मात्रा के लिए समान बीज वितरण प्रणाली (झुकी प्लेटें, कपनुमा मापक या खड़ी प्लेटें) वाली मशीनों का उपयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0055 बुआई से पूर्व सिंचाई के बाद पाटा/चैकी चलाने से मृदा में नमी संरक्षित रहती है और बीजों का जमाव अच्छा होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0057 बुआई के यंत्र ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0059 जीरो टिल प्लान्टर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0061 बिना अवशेष वाली भूमि में झुकी प्लेट या कपनुमा प्लेट बीज वितरण वाली मशीनों का प्रयोग बहुत सफल पाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0062 खेत में बिखरे हुए अवशेषों की उपस्थिति में अच्छी बुआई के लिए विभिन्न जीरो टिल यंत्र निम्न हैं: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0064 टर्बो सीडर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0066 टर्बो सीडर 8-10 टन/हैक्टर अवशेषों वाले खेत में सही ढंग से बुआई कर सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0067 इसे चलाने के लिए 50 हॉर्स पॉवर वाले ट्रैक्टर की आवश्यकता होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0069 पीसीआर प्लान्टर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0071 पीसीआर प्लान्टर एक ऐसी मशीन है, जिसमें अलग-अलग फसलों के बीजों की निश्चित मात्रा के लिए ऊर्ध्वाधर प्लेटें होती हैं एवं कतार को नियन्त्रित करने के लिए उपकरण लगा होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0072 यह मशीन 8-10 टन/हैक्टर तक सभी प्रकार के अवशेषों में बुआई के लिए उपयुक्त है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0073 यह यंत्र छोटे ट्रैक्टरों (35 हॉर्स पॉवर) से भी चलाया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0075 रोटरी डिस्क ड्रिल ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0077 यह मशीन रोटरी टिल मशीनीकरण पर आधारित है तथा रोटरी डिस्क ड्रिल ट्रैक्टर की पॉवर टेक ऑफ शॉफ्ट द्वारा चलाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0078 घूमती हुई डिस्क अवशेषों को समान रूप से काटती हुई मिट्‌टी के अंदर छोटी सी नाली में बीज एवं उर्वरक को डालती जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0079 इस मशीन द्वारा 7-8 टन/हैक्टर बिखरे हुए एवं खड़े अवशेषों में बीजों की बुआई की जा सकती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0081 डबल डिस्क कल्टर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0083 इस मशीन में डिस्क का सिरा भूमि का स्पर्श करता हुआ पादप अवशेषों को काटता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0084 मृदा में 'ट' आकार की नाली बनाते हुए बीज डालते जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0085 इस मशीन में मुखय समस्या यह है कि इसमें कम वजन होने के कारण यह अवशेषों को नहीं काटती है तथा बीज एवं उर्वरक अवशेषों के सतह पर ही रह जाते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0086 बीजों के अंकुरण के लिए बुआई के तुरन्त बाद, सिंचाई करने से अच्छा जमाव हो जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0087 यह मशीन 3-4 टन/हैक्टर अवशेषों में बुआई कर सकती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0089 बुआई का समय ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0091 खरीफ में धान की सीधी बुआई मानसून आने से 10-12 दिनों पूर्व करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0092 धान के अच्छे अंकुरण के लिए एवं कम वर्षा होने पर सिंचाई के बाद ही बुआई करें अथवा बुआई के तुरन्त बाद सिंचाई करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0093 अधिक वर्षा होने पर धान की पौध को पानी में डूबने से बचाने के लिए धान की पौध का वर्षा से पूर्व विकसित होना जरूरी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0095 बीज उपचार ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0097 बुआई के 10-12 घंटे पूर्व बीजों को पानी में भिगोकर बुआई करने पर अंकुरण अच्छा होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0098 उपचारित बीजों को बुआई से पूर्व छाया में सुखाएं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0099 बीजोपचार से बीजों में कई प्रकार के जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं, जो कि बीजों के अंकुरण और पौध की बढ़वार को बढ़ाते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0100 धान के बीजा को जीवाणुनाशक स्टे्रप्ट्रोसाइक्लिन (0.25 ग्राम/कि.ग्रा. बीज), फफूंदनाशक कार्बेन्डाजिम या थीरम (कार्बेन्डाजिम/थीरम 2 ग्राम/कि.ग्राबीज) द्वारा उपचारित करें, जिससे कि बीजजनित रोगों को दूर किया जा सके। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0101 कीट नुकसान से बचने के लिए थायमेथोक्सम (1 मि.ली./कि.ग्रा.) से बीज उपचारित करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0103 उर्वरक प्रबंध ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0105 खेतों से प्रति इकाई ज्यादा से ज्यादा उपज की प्राप्ति के लिए संतुलित खाद देना जरूरी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0106 आज कार्बनिक खाद का इस्तेमाल न के बराबर होने लगा है और उर्वरक का अधिक से अधिक उपयोग कर उपज उगाई जा रही है, जिससे सूक्ष्मपोषी तत्वों का असंतुलन हुआ है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0107 इसलिए मिट्‌टी जांच के आधार पर रासायनिक खाद के साथ कार्बनिक खाद का प्रयोग करके पोषक तत्वों के असंतुलन से बचा जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0109 -उर्वरक तत्वों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश की उचित मात्रा 150:60:40 कि.ग्रा./हैक्टर पाई गई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0110 -बुआई के समय 50 कि.ग्रा. डीएपी प्रति एकड़ मशीन से डालें तथा 30 कि.ग्रा. म्यूरेटऑफ पोटाश का छिड़काव करें या एनपीके के मिश्रण 12:32:16 को 75 कि.ग्रा. प्रति एकड़ की दर से मशीन द्वारा बिजाई के साथ डालें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0111 -यूरिया 35 कि.ग्रा./एकड़ का प्रयोग बुआई के समय, कल्ले फूटते समय और बाली बनते समय पर करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0112 -सीधी बोई गई धान की फसल के स्वस्थ पौधों के लिए जिंक या आयरन सल्फट का प्रयोग फसल मांग के अनुसार करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0114 खरपतवार नियंत्रण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0116 धान की सीधी बुआई में खरपतवार प्रमुख समस्या है, लेकिन सस्य क्रियाओं तथा रासायनिक विधियों के समन्वय से खरपतवारों का प्रभावी ढंग से नियंत्राण किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0117 सही फसल क्रम का चुनाव, प्रभेद चयन,जुताई कम करना, फसल अवशेष छोड़न एवं खरपतवारों की प्रारंभिक अवस्था में रासायनिक शाकनाशियों का प्रयोग करना भी इसमें शामिल है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0119 सतह पलवार मृदा ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0121 सतह पर फसलों के अवशेष छोड़ने से उगने वाले खरपतवारों से भौतिक बाधा उत्पन्न होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0122 जीरो टिलेज विधि में सतह अवशेष, खरपतवार के बीजों को खान वाले परभक्षियों को आवास प्रदान करते हैंतथा खरपतवारों के बीजों को सड़ाने में अधिक सहायक होते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0124 रासायनिक नियंत्रण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0126 अंकुरण से पूर्व शाकनाशियों का प्रयोग ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0128 पेन्डीमेथेलीन (स्टाम्प) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0130 1 कि.ग्रा सक्रिय तत्व 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0131 मृदा में नमी के अनुसार बुआई से 3 दिनों तक प्रयोग किया जाना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0133 अंकुरण के पश्चात शाकनाशी ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0135 पायरेजोसल्फ्यूरॉन(साथी) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0137 20 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से बुआई से 12-20 दिनों तक प्रयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0138 यह शाकनाशी मोथा व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर अधिक प्रभावी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0140 बिसपायरीबेक ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0142 25 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर की दर से बुआई के 15-25 दिनों बाद (झुनखूना, सामी, मोथा तथा अन्य चौड़ी पत्ती खरपतवारों पर प्रभावी)। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0144 पिनोक्ससुलाम ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0146 22.5 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर की दर से बुआई के 15-25 दिनों बाद लेप्टोक्लोवा, चिड़िया घास व मकड़ा घास के लिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0148 फनोक्सप्रोप+इथॉक्सी सल्फ्यूरॉन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0150 (60 ग्राम+18 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर) बुआई के 25 दिनों बाद छिड़कें तथा निर्देशों का पालन करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0151 इस मिश्रण का विलंब से प्रयोग करने से धान की फसल को नुकसान हो सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0152 घास कुल के खरपतवारों के लिए प्रभावी होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0154 एजिमसल्फ्यूरॉन या इथॉक्सी सल्फ्यूरॉन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0156 20-25 ग्राम या 18 ग्राम/ हैक्टर की दर से बुआई के 12-20 दिनों बाद प्रयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0157 यह शाकनाशी मोथा कुल के खरपतवार एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए प्रभावी होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0159 बिस्पायरिबेक+एजिमसल्फ्यूरॉन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0161 12.5 ग्राम + 17.5 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर की दर बुआई के 12-20 दिनों बाद प्रयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0162 यह मिश्रण सावां तथा मोथा प्रभावित खेतों में प्रभावी होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0164 प्रोपेनिल+ट्राक्लोपायर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0166 3 कि.ग्रा. +500 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर की दर बुआई के 15-25 दिनों बाद प्रयोग करें, प्रोपेनिल-घासकुल के लिए प्रभावी, ट्राक्लोपायर-चौड़ी पत्ती वाले व मोथा कुल के खरपतवारों पर प्रभावी होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0168 2-4 डी ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0170 500 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर की दर से बुआई के 10-30 दिनों बाद प्रयोग करें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0171 एकवर्षीय चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर प्रभावी होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0173 प्रयोग के बाद संतृप्त मृदा ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0175 फ्लेट फेन बहु नोजल बूम का प्रयोग करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0177 हानि ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0179 धान की सीधी बुआई द्वारा की गयी खेती में खरपतवारों की अधिकता होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0181 धान की सीधी बुआई से लाभ। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0182 समय की बचत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0184 -किसान का अतिरिक्त मशक्कत से बचाव लागत कम। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0185 -मृदा अपरदन कम अचानक पडे़ सूखे से उबरने की क्षमता। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0186 -अगली फसल की तैयारी के लिए पर्याप्त समय। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0187 -फसल चक्र एवं विविधीकरण को बढ़ावा ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0189 स्त्रोत : निखिल कुमार सिंह वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान, कृषि विज्ञान केन्द्र, बांदा और राजेश कुमार सिंह सह प्राध्यापक, उद्यान महाविद्यालय, बांदा, कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा, खेत पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0191 Unnat-Kirshi-Taknik-Link12: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0193 फव्वारा सिंचाई-फसलोत्पादन के लिए लाभकारी पद्धति ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0195 एक उचित विकल्प ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0197 सूक्ष्म सिंचाई पद्धति, फव्वारा सिंचाई जल की मांग-आपूर्ति के बीच अंतर कम करने एवं इसकी उपयोग दक्षता बढ़ाने का एक उचित विकल्प है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0198 पिछले 3 वर्षों में सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत आच्छादित क्षेत्रफल में काफी बढ़ोतरी हुई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0199 वर्ष 2017-18 में यह क्षेत्रफल बढ़कर 9.2 मिलियन हैक्टर हो गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0200 इसमें सुधार और किसानों के बीच इसके प्रसार के लिए और अधिक समन्वित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0202 सिंचाई की उन्नत विधियां (फव्वारा एवं टपक) एवं अधिक कृषि क्षेत्रफल ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0204 कृषि एवं पशुपालन में जल एक महत्वपूर्ण उत्पादन कारक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0205 इन कारकों की मात्राात्मक वृद्धि एवं इनकी प्रयोग दक्षता बढ़ाने में भी जल काफी सहायक होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0206 देश में कुल उपलब्ध जल का लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा कृषि में सिंचाई के रूप में प्रयुक्त होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0207 जल की घटती उपलब्धता(मानसूनी वर्षा में आ रही गिरावट एवं अनियमिता), जलवायु परिवर्तन तथा अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की बढ़ती मांग, भविष्य में जल की भारी कमी की तरफ संकेत करते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0208 एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक कृषि में जल की उपलब्धता घटकर 68 प्रतिशत तक आने की आशंका है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0209 नीति आयोग की रिपोर्ट में देश में जल की भयावह स्थिति के बारे में बताया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0210 अन्य वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कृषि में जल की खपत को 50 प्रतिशत स नीचे लाने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0211 खेती में सिंचाई के लिए भूजल का लगभग एक तिहाई हिस्सा उपयोग किय जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0212 भूजल के अंधाधुंध दोहन के कारण इसके स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0213 सिंचाई की परंपरागत विधि (प्रवाह विधि) में अधिक जल खपत के कारण भी जल की उपयोग दक्षता पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0214 इसके अतिरिक्त सिंचाई क्षेत्र में सभी स्तरों (सरकारी एवं निजी) पर अथक प्रयास के बावजूद अभी भी देश के शुष्क कृषि क्षेत्रफल के आधे से कम (49 प्रतिशत) हिस्से में सिंचाई सुविधा सृजित की जा सकी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0215 शेष बुआई क्षेत्रफल मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0216 जलवायु परिवर्तन का असिंचित (बारानी) क्षेत्रों पर सर्वाधिक असर होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0217 एक अनुमान के अनुसार बारानी फसलों से प्राप्त वार्षिक आमदनी सिंचित क्षेत्रों की अपेक्षा 25-30 प्रतिशत कम होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0218 ऐसी स्थिति में सिंचाई की उन्नत विधियों (फव्वारा एवं टपक) के तहत अधिक कृषि क्षेत्रफल को लाने की आवश्यकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0219 इससे उपलब्ध जल का समुचित एवं लाभकारी प्रयोग हो सकेगा तथा प्रति बूंद अधिक उपज एवं आमदनी प्राप्त की जा सकेगी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0221 अतएव कृषि में जल की उपलब्धता बनाये रखने, अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई करन तथा लागत में कमी लाने के लिए फव्वारा सिंचाई विधि खाद्यान्न फसलों के लिए एक उचित विकल्प है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0222 इस सिंचाई पद्धति में जल को छिड़काव के रूप में फसलों को दिया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0223 इससे जल पौधों पर बारिश की बूंदों की तरह पड़ता है एवं खेत में जल भराव भी नहीं होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0224 इस विधि से सिंचाई भूमि के ढलान के अनुरूप की जा सकती है एवं मृदा संरक्षण में सहायता मिलती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0225 सिंचाई की इस पद्धति में पौधों को समान मात्र में जल मिलता है, जिससे उनकी समान वृद्धि से अधिक उत्पादकता सुनिश्चित होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0226 अनाज फसलों के अतिरिक्त दलहनी एवं तिलहनी फसलों के लिए भी यह विधि बहुत उपयोगी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0227 इन फसलों में कम जल की आवश्यकता होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0228 प्रस्तुत लेख में फव्वारा सिंचाई पद्धति से प्राप्त लाभ का आकलन प्रक्षेत्र स्तर पर किसानों से एकत्र आंकड़ों पर आधारित है, जिसे राजस्थान राज्य के बीकानेर जिले से एकत्र किया गया। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0229 ये आंकड़े कृषि वर्ष 2017-18 से संबंधित हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0230 बीकानेर जिले में फव्वारा सिंचाई पद्धति प्रमुखता से अपनायी जा रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0231 इससे होने वाले लाभ के आकलन के लिए यादृच्छिक विधि से चयनित 120 किसानों से आंकड़े एकत्रित किए गए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0232 आंकड़ों का संग्रहणीकरण भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा एक प्रक्षेत्र सर्वेक्षण के तहत किया गया। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0233 चयनित किसानों के समूह में अंगीकृत तथा गैर अंगीकृत करने वाले दोनों प्रकार के किसानों से सूचनाएं संग्रहित की गईं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0235 सारणी 1. फव्वारा सिंचाई अपनाने के बाद कृषि क्षेत्रफल एवं उपज में अंतर का आकलन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0237 औसत कृषि क्षेत्रफल (हैक्टर) । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0238 औसत उपज (क्विंटल/हैक्टर) । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0239 अंगीकृत करने वाले किसान । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0240 अन्य किसान। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0241 अंगीकृत करने वाले किसान। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0243 खरीफ फसलें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0245 मोथ। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0246 बाजरा। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0247 मूंग। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0249 रबी फसलें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0250 बाजरा मूंग रबी फसलें गेहूं सरसों (21.3द्ध चना 4.00 1.13 2.87 1 स्रोतः प्रक्षेत्र सर्वेक्षण 2017-18, निआप, नई दिल्ली} कोष्ठकों में दिए गए अंक प्रतिशत अंतर दर्शाते है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0251 गेहूँ। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0252 सरसों। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0255 सूक्ष्म सिंचाई की राज्यवार प्रगति ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0257 सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली प्रमुख रूप से सरकारी अनुदान के अंतर्गत किसानों द्वारा अपनायी जा रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0258 इस सिंचाई पद्धति के तहत सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में (19.4 प्रतिशत) सृजित किया गया है, इसके बाद महाराष्ट्र (15.3 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (15.2 प्रतिशत), गुजरात (12.4 प्रतिशत) और कर्नाटक (11.4 प्रतिशत) आते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0259 इनके अतिरिक्त कुछ अन्य राज्यों-हरियाणा (6.3 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (5.2 प्रतिशत), तमिलनाडु (4.3 प्रतिशत) तथा छत्तीसगढ़ (3.1 प्रतिशत) ने भी सूक्ष्म सिंचाई के तहत क्षेत्रफल विस्तार में सफलता अर्जित की है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0260 उपरोक्त नौ राज्यों में सूक्ष्म सिंचाई के तहत कुल क्षेत्रफल का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा शामिल किया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0261 राज्यों के बीच राजस्थान को सूक्ष्म सिंचाई के क्षेत्र में नेतृत्व करने का गौरव प्राप्त है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0262 इसके साथ ही फव्वारा विधि के अंतर्गत लगभग एक तिहाई हिस्सा (33 प्रतिशत) इसी राज्य में सृजित किया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0263 विश्लेषण से पता चलता है कि हरियाणा, गुजरात तथा कर्नाटक आदि राज्य फव्वारा विधि में अधिक इच्छुक हैं, जबकि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु बूंद-बूंद विधि को अपनाने में अधिक रुचि ले रहे हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0265 फव्वारा सिंचाई पद्धति के लाभ ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0267 फव्वारा सिंचाई से होने वाले फसलवार लाभ का आकलन कृषि क्षेत्रफल में वृद्धि उपज में बढ़ोतरी तथा इससे प्राप्त शुद्ध लाभ के सन्दर्भ में किया गया है, जोकि इस प्रकार हैं ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0269 बुआई क्षेत्रफल एवं उपज में वृद्धि ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0271 फव्वारा सिंचाई को अपनाकर अंगीकृत किसानों ने ज्यादा क्षेत्रफल में फसलों की बुआई की एवं अधिक उपज प्राप्त की। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0272 आंकड़े दर्शाते हैं कि रबी फसलों के बुआई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी-तोरिया एवं सरसों में 21 प्रतिशत तथा चना फसल में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गयी (सारणी-1द्ध। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0273 चना क्षेत्रफल में वृद्धि सुनिश्चित सिंचाई के कारण संभव हुई, जो कि फसल के विकास एवं अधिक उपज के लिए आवश्यक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0274 रबी मौसम की गेहूं की फसल के क्षेत्रफल में भी 56 प्रतिशत की भरपूर सिंचाई से हरे खेत वृद्धि मिली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0275 इसी प्रकार खरीफ फसलों के बुआई क्षेत्रफल में वृद्धि-ग्विार में 42 प्रतिशत तथा बाजरा में 149 प्रतिशत दर्ज की गयी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0277 चयनित फसलों के बुआई क्षेत्रफल में वृद्धि की भांति इनकी प्रति हैक्टर उपज वृद्धि आकर्षक रही। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0278 खरीफ फसलों में अंगीकृत करने वाले किसानों ने अन्य किसानों की अपेक्षा अधिक उपज प्राप्त की जिसमें ग्वार में 15 प्रतिशत से लेकर बाजरा में 41 प्रतिशत तक की वृद्धि रही। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0279 रबी फसलों में प्रति हैक्टर उपज अंतर गेहूं में 6 प्रतिशत से लेकर चने में 43 प्रतिशत रहा। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0280 इसके अतिरिक्त अंगीकृत करने वाले किसानों ने फसल उत्पाद गुणवत्ता तथा उर्वरक उपयोग दक्षता आदि लाभ भी अनुभव किए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0282 जल की घटती उपलब्धता एवं विभिन्न क्षेत्रों की बढ़ती मांग-आपूर्ति के बीच सामंजस्य बनाने के लिए कृषि में फव्वारा सिंचाई एक उपयुक्त विकल्प है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0283 इस पद्धति को अपनाने से सिंचाई जल की उपयोग दक्षता में वृद्धि के साथ अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई सुनिश्चित होती है तथा किसानों को ज्यादा लाभ मिलता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0284 जलवायु परिवर्तन (मानसूनी वर्षा में कमी तथा इसमें अनियमितताद्ध, बढ़ता तापमान तथा औद्योगिकीकरण के कारण खेती में जल की उपलब्धता भविष्य में एक गंभीर चुनौती हो सकती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0285 इसलिए सिंचाई की फव्वारा विधि को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0286 पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में कापफी सफलता मिली है लेकिन इसमें अधिक समन्वित प्रयास की आवश्यकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0288 शुद्ध लाभ में बढ़ोतरी ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0290 फव्वारा सिंचाई के प्रयोग से खेती की प्रति हैक्टर कार्यशील लागत में बढ़ोतरी हुई पिफर भी अंगीकृत करने वाले किसानों ने गैर अंगीकृत किसानों की अपेक्षा अधिक शु( लाभ प्राप्त किए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0291 यह ग्वार फसल में 6,632 रुपये प्रति हैक्टर तथा मोथ में 20,302 रुपये प्रति हैक्टर मिला। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0292 इसी प्रकार गेहूं तथा चने की फसलों की कार्यशील लागत में वृद्धि क्रमशः 8.7 प्रतिशत तथा 1.5 प्रतिशत रही। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0293 इन फसलों से प्राप्त शुद्ध आय में वृद्धि क्रमशः 20.5 प्रतिशत तथा 38 प्रतिशत रही। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0294 इस प्रकार आंकड़े दर्शाते हैं कि फव्वारा सिंचाई के प्रयोग से अधिक क्षेत्रफल में बुआई, प्रति हैक्टर अधिक उपज तथा लाभ प्राप्त किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0296 सूक्ष्म सिंचाई की प्रगति एवं सरकारी प्रयास ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0298 सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई सुविधा सुनिश्चित करती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0299 इस पद्धति में दो सिंचाई विधियां-फव्वारा तथा टपक (बूंद-बूंद) प्रचलित है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0300 जल की घटती उपलब्धता एवं अन्य क्षेत्रों में जल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सूक्ष्म सिंचाई को मांग-प्रबंधन रणनीति के तौर पर वर्ष 2005-06 में एक केन्द्र प्रायोजित योजना के रूप में शुरु किया गया था। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0301 इस योजना की समीक्षा बैठकों में समय के साथ इसमें बदलाव किये गये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0302 वर्ष 2010 में उपरोक्त स्कीम को 'सूक्ष्म सिंचाई पर राष्ट्रीय मिशन' और वर्ष 2014 में फिर इसे 'सतत्‌ कृषि में राष्ट्रीय मिशन' के अंतर्गत 'प्रक्षेत्र स्तर पर जल प्रबंधन' के रूप में शुरू किया गया। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0303 वर्तमान में सूक्ष्म सिंचाई एवं सिंचाई की अन्य योजनाओं को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (2015) के तहत समाहित कर दिया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0304 इसका मुख्य उद्देश्य 'हर खेत को जल' तथा 'प्रति बूंद अधिक उपज' प्राप्त करना है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0305 प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई कार्यक्रम के लागू होने के बाद के वर्षों में सूक्ष्म सिंचाई के क्षेत्रफल में आकर्षक वृद्धि हुई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0306 इसके तहत कुल क्षेत्रफल बढ़कर 9.2 मिलियन हैक्टर हो गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0307 यह इस विधि के तहत लाये जाने वाले संभावित क्षेत्रफल (69.5 मिलियन हैक्टर) का लगभग 13 प्रतिशत है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0309 स्त्रोत : सन्त कुमार, सुरेश पाल, प्रमोद कुमार', मोहम्मद अवैस और अजय तंवर भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान, डीपीएस मार्ग, पूसा, नई दिल्ली-110012 'कृषि अर्थशास्त्र संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012 ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0311 Unnat-Kirshi-Taknik-Link13: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0313 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल या एकीकृत खेती प्रारूप – लघु किसानों के लिए मुनाफे का सौदा ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0317 विश्व के कुल भूमि क्षेत्र का 2.4 प्रतिशत एवं कुल जनसंख्या का 18 प्रतिशत हिस्सा भारत देश के अंतर्गत आता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0318 भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0319 देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0320 देश का व्यापक आर्थिक विकास होने के बाद भी सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का आर्थिक योगदान तेजी से घट रहा है फिर भी कृषि, जनसंख्या की दृष्टि से मुख्य आर्थिक क्षेत्र बना हुआ है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0321 कृषि, भारत की कुल जनसंख्या के 58 प्रतिशत से अधिक लोगों की आजीविका का मुख्य स्त्रोत है किन्तु कई समस्याओं की वजह से यह क्षेत्र अच्छी तरह से विकसित नहीं हुआ है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0322 हरित क्रान्ति के 4 दशक बाद भी बढ़ती जनसंख्या व भाहरीकरण के कारण खेती की जोत का आकार सिकुड़ना व फसलों की कम उत्पादकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0323 देश में कृषि की खराब स्थिति भारतीयों के लिए चिंता की बात है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0324 आज देश में 50 प्रतिशत किसानों के पास एक हैक्टेयर से भी कम जमीन है एवं 80 प्रतिशत किसानों के पास दो हैक्टेयर से भी कम जमीन है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0325 लगभग 70-75 प्रतिशत क्षेत्रफल सीमांत एवं लघु किसानों के अंतर्गत आता है जहां पर धान-गेहूं फसल प्रणाली को अपनाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0326 भारत के पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कुल खाद्यान का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है जिस कारण इस क्षेत्र को देश का अनाज का कटोरा कहा जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0327 किन्तु यह क्षेत्र भी कई समस्याओं से ग्रस्त होता जा रहा है जैसे लगातार धान उगाने से भूमिगत जलस्तर काफी नीचे गिरता जा रहा है जो आज चिंता का विषय बन गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0328 आजकल धान-गेहूं फसल प्रणाली के टिकाऊपन पर भी सवालिया निशान लगा हुआ है क्योंकि अधिक पैदावार पाने के लिए खेती की सघन पद्धति को लगातार अपनाने से मृदा में कार्बनिक पदार्थो एवं पोषक तत्वों की कमी, उनका बिगड़ता संतुलन, भूजल स्तर का नीचे जाना, कीटों, रोगों तथा खरपतवारों का अधिक प्रकोप इत्यादि समस्याएं आ रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0329 इसके अतिरिक्त वैश्विक तपन के प्रभाव से उत्तरी भारत में सर्दी की अवधि कम होती जा रही है और फरवरी माह से ही तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है जिसके फलस्वरूप गेहूं के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों से कमी आई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0330 ऐसे में उम्मीद के मुताबिक़ उपज पाने के लिए किसानों को 5-10 प्रतिशत अधिक खर्च करना पड़ता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0331 आने वाले समय में उपरोक्त समस्याएं और अधिक विकराल हो जाएंगी यदि अभी कोई कारगर उपाय नहीं अपनाया गया। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0333 धान-गेहूं फसल प्रणाली को अपनाने से वर्ष में केवल दो बार फसल की कटाई के समय ही आमदनी प्राप्त होती है जबकि किसान को प्रतिदिन खर्चे के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0334 मध्य एवं दक्षिण भारत में जहां एकल फसल प्रणाली अपनाई जाती है वहां फसल में रोग की सम्भावनाएं अधिक रहती हैं व अन्य कारणों से भी वांछित उपज प्राप्त नहीं होती है जिसके कारण किसान कर्ज के बोझ तले आ जाता है व उसे चुकाने में असमर्थ हो जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0335 सीमांत एवं लघु किसानों के लिए अपने औसतन 5-6 सदस्यों के परिवार एवं उतने ही पशुओं की दैनिक जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी समस्या है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0336 अत: हमें ऐसी खेती की जरूरत है जो प्राकृतिक संसाधनों की दक्षता में वृद्धि के साथ-साथ किसान की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर सके एवं किसान के परिवार के सभी सदस्यों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान कर सके। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0337 इसके लिए यह आवश्यक है की प्रचलित धान-गेहूं फसल प्रणाली में सुधार किया जाए, फसल विविधिकरण किया जाए और फसलोत्पादन को कृषि के अन्य सहायक व्यवसायों के साथ जोड़ा जाए जिससे की भूमि की उर्वराशक्ति को कायम रखने और भूमिगत जलस्तर को गिरने से रोका जा सके, साथ ही किसान को वर्ष भर लगातार आमदनी प्राप्त होती रहे। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0338 ऐसी स्थिति में बहुउद्देशीय कृषि मॉडल हमारे सामने उपयुक्त समाधान के रूप में उभर कर आता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0340 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल, कृषि के विभिन्न घटकों/उद्यमों जो एक दूसरे से संबंधित और परस्पर पूरक होते हैं, से बनी एक समन्वित कृषि तकनीक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0341 इस तकनीक में किसान, फसलोत्पादन (अन्न, चारा, सब्जी, फूल एवं फल उत्पादन) के साथ-साथ कृषि से सम्बधित अन्य घटकों या उद्यमों/कृषि आधारित उद्योगों जैसे पशुपालन, मछली पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, बत्तख पालन, मशरूम उत्पादन, कम्पोस्ट उत्पादन, सौर ऊर्जा उत्पादन एवं जैविक गैस (बायो गैस) उत्पादन इत्यादि को अपनाकर उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुए परिवार की नियमित आमदनी और रोजगार को कई गुणा बढ़या जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0342 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में एक घटक से बचे हुए उत्पादों तथा अवशेषों को दूसरे घटकों में उपयोग किया जा सकता है जिससे उत्पादन लागत कम होने से शुद्ध लाभ में वृद्धि होती है और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0343 इस मॉडल में फसलों के अवशेषों को कम्पोस्ट बनाने में प्रयोग किया जा सकता है और पशुओं से प्राप्त गोबर का उपयोग गोबर गैस, मछली उत्पादन और वर्मीकम्पोस्ट आदि बनाने में किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0344 अतएव बहुउद्देशीय कृषि सीमांत एवं लघु किसानों के जीविकोपार्जन की एक नई दिशा प्रदान करता है, साथ ही साथ भूमि एवं जल संसाधनों की गुणवत्ता को भी स्थिरता प्रदान करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0345 इस मॉडल के उद्देश्य इस प्रकार है: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0347 1. बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में उपलब्ध फसलों एवं घटकों के विविधिकरण का सुधरी हुई क्षारीय मृदाओं में मूल्यांकन करना। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0349 2. सीमांत एवं लघु किसानों हेतु लाभदायक, टिकाऊ एवं पर्यावरण अनुकूल बहुउद्देशीय कृषि मॉडल का विकास करना। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0351 3. फसल विविधिकरण प्रणाली द्वारा जल एवं भूमि की उर्वरता तथा ऊर्जा प्रयोग की दक्षता को बढ़ाना। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0353 4. फसलों के अवशेषों को पूरक घटकों में प्रयोग करके प्रति इकाई उत्पादन लागत कम करना। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0355 बहुउद्देशीय कृषि के घटक ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0357 संस्थान प्रक्षेत्र के 2 हेक्टेयर क्षेत्रफल को मुख्य घटकों के लिए 0.2 हेक्टेयर के बराबर आकार के भागों में विभाजित किया गया जिसमें विभिन्न कृषि उत्पादों का उत्पादन निम्नांकित ढंग से किया गया। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0358 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल के विभिन्न घटकों को मुख्यत: दो भागों (फसल घटक एवं सहायक घटक) में विभाजित किया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0360 फसल घटक: 1.8 हेक्टेयर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0362 (1) अन्न उत्पादन (40 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.8 हेक्टेयर) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0364 धान-गेहूं फसल प्रणाली को अपनाने से भूजल स्तर एवं भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी आ रही है क्योंकि इस फसल प्रणाली को अधिक सिंचाईयों एवं पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0365 इस मॉडल में धान-गेहूं फसल प्रणाली के अलावा 3 अन्य वैकल्पिक फसल प्रणालियों का चयन किया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0366 भूमि उर्वरता को बनाए रखने के लिए धान-गेहूं फसल प्रणाली के अलावा सभी फसल प्रणालियों में एक दलहनी फसल को सम्मिलित किया गया जो की वायुमंडल से नत्रजन लेकर भूमि में नत्रजन का समावेश कर मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0367 अन्न उत्पादन के अंतर्गत 4 फसल प्रणालियों को अपनाया गया है जो इस प्रकार है-। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0369 1. 10प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान-गेहूं फसल प्रणाली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0370 2. 10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में मक्का-गेहूं फसल प्रणाली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0371 3. 10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सोयाबीन-मक्का फसल प्रणाली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0372 4. 10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अरहर-सरसों-मक्कचरी फसल प्रणाली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0374 (2) चारा उत्पादन (20 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.4 हेक्टेयर)। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0376 मॉडल में सम्मिलित चार बड़े पशुओं की वर्षभर हरे चारे की पूर्ति करने के लिए कुछ क्षेत्रफल के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल में चारा फसलें जैसे खरीफ में ज्वार, बाजरा एवं मक्का और रबी में बरसीम, बरसीम + सरसों और जई को लगाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0377 चारा फसलों को इस प्रकार क्रम में लगाया जाता है ताकि हरे चारे की सालभर कमी नही आये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0379 (3) सब्जी उत्पादन (10 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.2 हेक्टेयर) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0381 पूरे वर्ष सब्जियों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए खरीफ के मौसम में टमाटर, घीया, खीरा, भिन्डी आदि एवं रबी में पत्ता गोभी, फूल गोभी, टमाटर आदि एवं जायद के मौसम में टमाटर, घीया, खीरा आदि सब्जियों को लगाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0382 बाजार में सब्जियों की कीमत को ध्यान में रखते हुए इन्हें उचित समय पर लगाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0384 (4) फूल उत्पादन (10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0386 इस उत्पादन घटक के अंर्तगत रबी के मौसम में गेंदा और ग्लेडियोलस को लगाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0387 खरीफ के मौसम में कोई उपयुक्त फूल वाली फसल उपलब्ध नहीं होने के कारण बेबीकार्न, की फसल को लगाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0388 मधुमक्खी पालन के लिए मधुमक्खी के बक्सों को फूल उत्पादन क्षेत्रफल के पास रखा गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0390 (5) फल एवं सब्जी उत्पादन (10 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.2 हेक्टेयर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0392 इस उत्पादन घटक के अंतर्गत अमरुद की इलाहाबादी सफेदा प्रजाति को 5 मीटर x 5 मीटर की दूरी पर सब्जी वाली फसलों के साथ लगाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0393 फलों के वृक्षों की कतारों के बीच पड़े खाली स्थान पर अंतर फसल के रूप में मौसमी सब्जियां उगाई गई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0394 सब्जियां जैसे टमाटर, भिन्डी, पत्ता गोभी, फूलगोभी आदि को लगाया जाता है जहां तक हो सके फैलनें वाली सब्जियों (घीया एवं खीरा) को नहीं लगाना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0396 सहायक घटक: 0.2 हेक्टेयर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0398 1. मछली उत्पादन (10 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.2 हेक्टेयर): बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में मछली पालन 0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल के तालाब में किया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0399 मछली पालन के साथ-साथ तालाब की मुंडेर (6-8 मीटर चौड़ाई की डाइक्स/बंड) पफ फलदार वृक्ष जैसे अमरुद, केला, आंवला एवं करौंदा को लगाया गया है तथा वृक्षों के बीच खाली स्थान पर मौसम के अनुसार विभिन्न सब्जियां जैसे पालक, मेथी, मूली, गोभी तथा गर्मी और बरसात में भिन्डी, कद्दू, तरोई, लौकी आदि उगाई जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0400 फलों एवं सब्जियों में सिंचाई सौर ऊर्जा द्वारा चलित ड्रिप तथा ऊँचाई पर स्थित पानी की टंकी से उत्पन्न होने वाले दबाव द्वारा चलित ड्रिप विधि से की गई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0402 इसके अलावा तालाब की मुंडेर के पास बहुउद्देशीय कृषि के अन्य घटकों/व्यवसायों को अपनाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0404 1. पशुपालन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0405 2. मुर्गी एवं बत्तख पालन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0406 3. मशरूम उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0407 4. मधुमक्खी पालन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0408 5. जैविक गैस उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0409 6. कम्पोस्ट उत्पादन एवं सौर ऊर्जा उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0411 तालिका 1. बहुउद्देशीय कृषि मॉडल के विभिन्न घटकों से प्राप्त आमदनी, क्रियान्वयन लागत एवं शुद्ध आय का लेखा-जोखा। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0413 बहुउद्देशीय कृषि के घटक। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0414 औसतन वार्षिक (रु.)। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0415 कुल आमदनी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0416 क्रियान्वयन लागत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0417 शुद्ध आय। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0419 फसल घटक – 1.8 हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0420 अन्न उत्पादन – हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0421 चारा उत्पादन- हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0422 फूल उत्पादन – हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0423 सब्जी उत्पादन – हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0424 फल एवं सब्जी उत्पादन – हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0425 उपयोग। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0426 सहायक घटक – 0.2 हेक्टेयर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0427 पशुपालन (दूध+कम्पोस्ट+जैविक गैस)। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0428 तालाब की मुंडेर पर फलदार वृक्ष एवं सब्जियां। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0429 मछली उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0430 मुर्गी एवं बत्तख पालन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0432 मधुमक्खी पालन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0434 कुल योग ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0436 कोष्ठक में आंकड़े औसतन आमदनी प्रतिदिन (रु.) को दर्शाते है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0438 बहुउद्देशीय कृषि घटकों का उत्पादन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0440 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल को अपनाने से फसल घटकों से वर्ष में केवल दो बार फसल की कटाई के समय ही आमदनी प्राप्त होती है जबकि सहायक घटकों से प्रतिदिन आमदनी प्राप्त होती है जोकि किसान की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने एवं रोजगार के अवसर प्रदान करने में सहायक होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0441 फसल एवं सहायक घटकों से उत्पन्न कुल आमदनी, क्रियान्वयन लागत एवं शुद्ध आमदनी का विवरण तालिका-1 में दर्शाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0442 2 हेक्टेयर बहुउद्देशीय कृषि मॉडल को अपनाने से कुल आमदनी 411799/- रूपये आर्जित हुई जबकि इससे कुल 270946/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हुई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0443 परिणामों में यह निष्कर्ष निकलता है कि 2 हेक्टेयर के बहुउद्देशीय कृषि मॉडल से प्रतिदिन 742/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0445 फसल घटकों से कुल आमदनी 155617/- रूपये अर्जित हुई जबकि इससे प्रतिवर्ष 119390/- रूपये एवं प्रतिदिन 327/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हुई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0446 फल आधारित उत्पादन पद्धति से सबसे अधिक 16610/- रूपये प्रति 0.2 हेक्टेयर का शुद्ध लाभ मिला। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0447 पशु पालन कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है जिसके द्वारा वर्षभर आमदनी और रोजगार मिलता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0448 पशु पालन के बिना बहुउद्देशीय कृषि अधूरी प्रतीत होती है इसलिए इसका समावेश करना बेहद जरूरी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0449 पशुओं से दुग्ध उत्पादन के अलावा गोबर एवं मूत्र भी मिलता है जो की कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट एवं जैविक गैस इत्यादि बनाने में काम में लिया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0450 पशुओं के लिए दाना मिश्रण को भी फसल उत्पादों से फार्म पर ही बनाया गया है ताकि लागत को कम किया जा सके तथा उसकी गुणवत्ता को बनाए रखा जा सके। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0451 सहायक घटकों से कुल आमदनी 256182/- रूपये अर्जित हुई जबकि इससे प्रतिवर्ष 151556/- रूपये एवं प्रतिदिन 415/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हुई है जोकि रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त हो सकती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0452 सहायक घटकों के तहत पशु पालन के घटकों (दूध+कम्पोस्ट+जैविक गैस) से सबसे अधिक शुद्ध आमदनी 108891/- रूपये प्राप्त हुई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0454 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल का फसल उत्पादन घटकों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0456 विभिन्न फसलों का आर्थिक विश्लेषण तालिका-2 में दिखाया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0457 परिणामों से ज्ञात हुआ की फल आधारित उत्पादन पद्धति से सबसे अधिक 166104/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर का शुद्ध लाभ मिला जबकि फूल उत्पादन से सबसे कम 92317/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर का लाभ प्राप्त हुआ। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0458 अन्न उत्पादन के अंतर्गत आने वाली सभी 4 फसल प्रणालियों (धान-गेहूं, मक्का-गेहूं-मूंग, सोयाबीन-मक्का एवं अरहर-सरसों-मक्कचरी) को अपनाने से 130677/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर का लाभ प्राप्त हुआ। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0459 सभी फसल प्रणालियों के तहत, धान-गेहूं फसल (174849/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर) एवं मक्का-गेहूं-मूंग प्रणाली (164375/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर) का सबसे अधिक योगदान रहा। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0460 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल से प्राप्त शुद्ध आमदनी को फसल उत्पादन घटकों से तुलना करने पर यह पाया की फल एवं सब्जी उत्पादन एवं धान-गेहूं फसल प्रणाली से लगभग 100000/- रूपये की शुद्ध आमदनी अधिक प्राप्त हुई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0462 तालिका 2: फसल उत्पादन घटकों एवं फसल प्रणालियों का बहुउद्देशीय कृषि मॉडल के साथ आकलन एवं आर्थिक विश्लेष्ण (रूपये/2 हें.) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0464 फसल उत्पादन घटक। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0467 शुद्ध आमदनी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0468 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0469 अन्न उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0470 चारा उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0471 सब्जी उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0472 फूल उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0473 फल एवं सब्जी उत्पादन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0474 धान-गेहूं फसल प्रणाली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0475 मक्का-गेहूं-मूंग फसल प्रणाली। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0477 संसाधनों का पुनर्चक्रण/समेकित प्रबन्धन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0479 बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में उपलब्ध विभिन्न संसाधनों को कृषि विविधिकरण प्रणाली में पुनर्चक्रण किया गया ताकि पानी, पोषण और ऊर्जा की दक्षता को बढ़ाया जा सके। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0480 पशु, मछलियाँ, मुर्गियां एव बत्तखें अपना भोजन चारा और खाद्यान्न फसलों से प्राप्त करते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0481 पशुओं से प्राप्त गोबर का अधिकतर भाग कम्पोस्ट बनाने में इस्तेमाल किया जाता है और उस खाद का उपयोग तालाब के ऊपर बनी मेड़ों पर उगाए गए फल वृक्षों और सब्जी उत्पादन में किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0482 तालाब की मेड़ों पर कोई भी रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता है ताकि जैविक उत्पाद लिया जा सकें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0483 ऐसा करने से मृदा में जैविक कार्बन का प्रतिशत बढ़ा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0484 गोबर से उत्पन्न बायोगैस एक औसत परिवार के खाना बनाने के लिए पर्याप्त होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0485 पशुओं का मूत्र एवं उनके शेड की धोवन को मछलियों के भोजन हेतु तालाब में डाला गया है जिससे तालाब में उपस्थित पादप प्लावकों (फाइटोप्लेंकटोंस) एवं जीव प्लावकों (जूप्लेंकटोंस) की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी होती है जो मछलियों के लिए खाने का अच्छा स्रोत है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0486 केले के पत्ते, अधिक पक्के फलों और पकी हुई सब्जियों को भी मछलियों के भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0487 तालाब का पौष्टिक पानी गर्मी के मौसम में चारा फसलों की सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_11-13-translation-hin2tel_0488 तालाब की मिट्टी को भी खेत में प्रयोग करने से मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में सुधार होता है।