ID SENT ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0001 Unnat-Kirshi-Taknik-Link5: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0003 खेती में मशीनीकरण को बढ़ावा देने की भारत सरकार की पहल ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0005 दक्षता और प्रभावोत्‍पादकता में सुधार ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0007 कृषि क्षेत्र में खेती-बाड़ी में मशीनीकरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फसल उत्पादन में उपयोग में लाई जा रही कार्यप्रणाली की दक्षता और प्रभावोत्‍पादकता में सुधार लाने में योगदान देता है जिससे फसलों की उत्पादकता में भी वृद्धि होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0008 यह विभिन्न कृषि कार्यों से जुड़े कठोर परिश्रम को भी कम करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0010 सब मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन (एसएमएएम) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0012 देश में कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा देने के लिए, भारत सरकार द्वारा 2014-15 में एक विशेष समर्पित योजना ‘सब मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन (एसएमएएम) शुरू की गई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0013 इस योजना का उद्देश्य कस्टम हायरिंग सेंटर्स (सीएचसी) की स्थापना के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों (एसएमई) के लिए कृषि मशीनों को सुलभ और सस्ती बनाकर, हाई-टेक और उच्च मूल्य वाले कृषि उपकरण और फार्म मशीनरी बैंकों के लिए केन्‍द्र बनाकर उन लोगों तक पहुंचाना है जिनकी 'पहुंच से अब तक यह बाहर' है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0014 किसान को विभिन्न रियायती कृषि उपकरण और मशीनों का वितरण भी योजना के तहत शामिल गतिविधियों में से एक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0015 एसएमएफ के लिए कृषि मशीनों की खरीद वित्तीय रूप से संभव नहीं है, इसलिए कस्टम हायरिंग संस्था एसएमएफ को मशीनों का विकल्प किराए पर देने का प्रावधान करती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0016 मशीन के परिचालन और किसानों और युवाओं तथा अन्‍य के कौशल विकास प्रदर्शन के माध्यम से हितधारकों में जागरूकता पैदा करना भी एसएमएएम के घटक हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0017 देश भर में स्थित नामित परीक्षण केंद्रों पर मशीनों का प्रदर्शन परीक्षण और प्रमाणन कृषि मशीनरी को गुणात्मक, प्रभावी और कुशलतापूर्वक सुनिश्चित कर रहा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0019 कस्टम हायरिंग संस्थान ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0021 राज्यों और अन्य कार्यान्वयन संस्थानों को इस योजना के तहत 2014-15 से 2020-21 के दौरान, 4556.93 करोड़ रुपये की धनराशि जारी की गई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0022 अब तक, 13 लाख से अधिक कृषि मशीनों का वितरण किया जा चुका है और 27.5 हजार से अधिक कस्टम हायरिंग संस्थान स्थापित किए गए हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0023 वर्ष 2021-22 में एसएमएएम के लिए 1050 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0025 कृषि शक्ति की उपलब्धता में उत्तरोत्तर वृद्धि ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0027 कृषि यंत्रीकरण पर भारत सरकार के कार्यक्रमों और योजनाओं के परिणामस्वरूप विभिन्न कृषि कार्यों को करने के लिए प्रति यूनिट क्षेत्र में कृषि शक्ति की उपलब्धता में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0028 खेती के लिए बिजली की उपलब्धता 2016-17 में 2.02 किलोवाट/ हेक्टेयर से बढ़कर 2018-19 में 2.49 किलोवाट/ हेक्‍टेयरहो गई। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0029 समय के साथ खेती करने के लिए मशीनों को अपनाने में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें फसली क्षेत्र, फसल की तीव्रता और देश के कृषि उत्पादन का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0031 स्त्रोत : पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0033 Unnat-Kirshi-Taknik-Link6: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0035 छाया घर (शेड हाउस) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0037 छाया घर एग्रो जालों या अन्य बुनी हुई सामग्री से बना हुआ ऐसा ढांचा होता है जिसमे खुली जगहों से आवश्यक धूप, नमी व वायु के प्रवेश के दार होते है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0038 यह पौधे के विकास के लिये सहायक उचित सूक्ष्म वातावरण बनाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0039 इसे शेडनेट घर या नेट घर भी कहा जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0041 छाया घर के उपयोग ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0043 -यह फूलों, बेलबूटेदार, जडी-बूटी, सब्ज़ियों एवं मसालों के पौधों की खेती में मदद करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0044 -फलों व सब्ज़ियों की नर्सरियों तथा जंगली प्रजातियों आदि के लिये उपयोग किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0045 -विभिन्न कृषि उत्पादों की गुणवत्तापूर्ण सुखाई में मदद करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0046 -कीट प्रकोप के विरुद्ध सुरक्षा के लिये उपयोग किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0047 -आंधी , वर्षा, ओले व पाले जैसे मौसम के प्राकृतिक प्रकोपों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0048 -कलम की कोपलों के उत्पादन तथा गर्मियों के दिनों में उनकी मृत्यु दर कम करने के लिये उपयोग किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0049 -टिशू कल्चर के पौधों की मज़बूती के लिये उपयोग किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0051 छाया घर के लिये नियोजन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0053 छाया घर के ढांचे का नियोजन फसल के प्रकार, स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री व स्थानीय मौसमी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0054 भविष्य की आकार वृद्धि के लिये प्रावधान होना चाहिये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0056 स्थल का चयन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0058 छाया घर ऐसी जगह बनाया जाना चाहिये कि वह सामग्री लाने एवं उपज के विक्रय के लिये बाज़ार से आसानी से जुडा हो। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0059 यह ढांचा भवनों एवं पेड़ों से दूर लगाया जाना चाहिये एवं औद्योगिक या वाहनगत प्रदूषण से भी दूर। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0060 स्थल पर पानी के निकास की समस्या नहीं होनी चाहिये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0061 बिजली तथा अच्छी गुणवत्ता के पानी का प्रावधान होना चाहिये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0062 लेकिन, वायु कि गति कम करने के उपाय (विंड ब्रेकर) ढांचे से 30 मीटर दूर लगाये जा सकते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0064 अभिविन्यास ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0066 छाया घर के अभिविन्यास के लिये मुख्य रूप से दो पैमाने हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0067 वे हैं, छाया घर में अपरिवर्तनशील प्रकाश की तीव्रता व हवा की दिशा। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0068 एक मेहराब के ढांचे का पूर्व-पश्चिम या उत्तर-दक्षिण दिशा में अभिविन्यास किया जा सकता है लेकिन बहु-मेहराब के ढांचे को अपरिवर्तनशील प्रकाश की तीव्रता के लिये उत्तर-दक्षिण दिशा में अभिविन्याशित किया जाना चाहिये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0070 संरचना की सामग्री ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0078 छाया घर के ढांचे में मूल रूप से दो भाग होते हैं यानि फ्रेम तथा आवरण की सामग्री। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0079 छाया घर फ्रेम आवरण सामग्री को सहारा देती है और उसे हवा, बारिश तथा फसल के भार से बचाव के लिये डिज़ाइन किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0080 यदि जंगरोधी उपचार नियमित अंतराल पर किया जाये तो छाया घर की लोहे के एंगल की फ्रेम 20 से 25 साल तक बरकरार रहती है, जबकि बांस का ढांचा 3 साल तक रह सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0081 एग्रो शेडनेट 3 से 5 साल तक रहता है जो मौसम की परिस्थिति पर निर्भर होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0082 शेडनेट विभिन्न रंगों में उपलब्ध होते हैं और उनमें शेड के प्रतिशत की विस्तृत श्रंखला होती है यानि 25%, 30%, 35%, 50%, 60%, 75% एवं 90%। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0084 छाया घर की फ्रेमों की डिज़ाइन आवश्यकता तथा इंजीनियरिंग कौशल पर निर्भर होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0085 उडीसा जैसे भारी बारिश के क्षेत्रों में कोंसेट, गेबल या गॉथिक आकार की संरचनात्मक फ्रेमें या स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल मामूली संशोधन के साथ फ्रेमों की अनुशंसा की जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0087 छाया घर की डिज़ाइन व संरचना ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0089 प्रिसिज़न फार्मिंग डेवलपमेंट सेंटर, कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर में दो प्रकार के छाया घर डिज़ाइन विकसित किये गये हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0090 इन छाया घरो का मुख्य लाभ यह है कि इन संरचनाओं में निर्माणश्तल पर किसी वेल्डिंग की आवश्यकता नहीं होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0091 अन्य लाभ यह है कि इन दीमक के प्रकोप से संरचनाओं की सुरक्षा के लिये आधार के खम्भों का चयन किया गया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0092 इन शेडहाउसों के विवरण नीचे दिये गये हैं: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0094 छाया घर I : ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0096 इस डिज़ाइन (चित्र 1) में लोहे के एंगल (35 मिमी x 35 मिमी x 6 मिमी) तथा बांस का संरचनात्मक फ्रेम के लिये उपयोग होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0097 लोहे के एंगल का उपयोग आधार स्तम्भ के रूप में होता है जिसमें पकड़ के लिये नीचे व बांस को पकड़ने के लिये ऊपर ‘यू’ क्लिप का प्रावधान होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0098 बांस का उपयोग कडी तथा छज्जे की संरचना, दोनों के लिये होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0099 छाया घर साइट के समतल करने के बाद जमाव की योजना बनायी जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0100 आधार स्तम्भों के लिये गड्ढे खोदे जाते हैं, गड्ढों का एक हिस्सा रेत से भरा जाता है और अच्छी तरह से जमा दिया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0101 उसके बाद आधार स्तम्भों को तीन समांतर पंक्तियों में बराबर दूरी सुनिश्चित करते हुए सीमेंट कॉंक्रीट से पक्का किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0102 उचित उपचार के बाद उचित माप के बांस को कड़ी, छज्जे की गोलाई की संरचना के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और उचित तरीके से बांध दिया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0103 पहले से तैयार सिरे की फ्रेम व दरवाज़े की फ्रेम को नट-बोल्ट के ज़रिए ढांचे से कस दिया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0104 उसके बाद 50%-75% की एग्रो शेडनेट को छज्जे से कस दिया जाता है तथा 30% की नेट को साइड फ्रेम से कस दिया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0105 अन्दरूनी फ्रेमें व दरवाज़े भी शेडनेट से ढक दिये जाते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0106 अंत में बीच की फर्श और बाउंड्री रिज लाइन को ईंट की जुडाई से बनाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0107 इस प्रकार की छाया घर संरचना का इकाई मूल्य लगभग रु.225/स्क्वे.मी. होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0108 इस प्रकार के छाया घर में इस्तेमाल किये जाने वाली सामग्री नीचे तालिका 1 में दर्शायी गयी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0110 शेड हाउस II : ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0112 इस डिज़ाइन (चित्र 2) में छाया घर की संरचना के लिये आधार स्तम्भों, कड़ियों, सिरे की फ्रेम तथा दरवाज़े के लिये लोहे के एंगल (40 मिमी x 40 मिमी x 6 मिमी) का उपयोग होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0113 लोहे की पट्टी का उपयोग आवरण साम्ग्री के हूप्स के लिये होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0114 आधार स्तम्भों में कडियों वा हूप्स के साथ कसने के लिये नट-बोल्ट का प्रावधान होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0115 इसी तरह से हूप्स के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली लोहे की पट्टियों में कडियों के साथ कसने का प्रावधान होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0116 निर्माण स्थल पर लेवलिंग तथा जमाय की योजना पिछले मामले की तरह किये जाते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0117 आधार स्तम्भों को गड्ढों में सीमेंट कॉंक्रीट से पक्का किया जाता है और उपचारसात दिनों तक किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0118 कडियों, हूप्स, सिरे की फ्रेम व दरवाज़े की फ्रेम को नट-बोल्ट के ज़रिए ढांचे से कस दिया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0119 इसके बाद नेट को संरचना पर लगाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0120 अंत में बीच का फर्श तथा बाउंड्री रिज लाइन को ईंट की जुडाई से बनाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0121 इस प्रकार की छाया घर संरचना का इकाई मूल्य लगभग रु.500/स्क्वे.मी. होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0122 इस प्रकार के छाया घर में इस्तेमाल किये जाने वाली सामग्री नीचे तालिका 2 में दर्शायी गयी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0124 Unnat-Kirshi-Taknik-Link7: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0126 जीरो टिलेज तकनीक से गेहूं एवं मूंग की खेती ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0128 गेहूं और मूंग की खेती का रकबा ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0130 भारत में गेहूं की खेती लगभग 30 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल में होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0131 मध्य प्रदेश में लगभग 60 लाख हैक्टर क्षेत्र गेहूं के अंतर्गत आता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0132 इस रकबे का कम या ज्यादा होना प्रत्येक वर्ष की वर्षा पर निर्भर करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0133 यहां पर गेहूं का औसत उत्पादन 18 क्विंटल प्रति हैक्टर है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0134 देश का औसत उत्पादन 29 क्विंटल प्रति हैक्टर है, जो कि यहां के औसत उत्पादन से कहीं ज्यादा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0135 गेहूं के कम उत्पादन होने के प्रमुख कारणों में, बुआई के समय अधिक तापमान, फसल अवधि औसतन 125 दिनों से कम एवं सिंचाई जल की कमी का उल्लेख किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0136 वर्तमान में प्रदेश में 70 प्रतिशत रकबे में यह फसल अर्ध्द एवं सिंचित दशा में उगाई जा रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0137 उन्नत किस्म एवं उत्पादन तकनीकी तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाकर निश्चित तौर पर उत्पादन में आशातीत वृद्धि की जा सकती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0138 इस प्रकार कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में गेहूं उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0140 केस अध्ययन- जबलपुर में कृषि ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0142 जबलपुर जिले में सिंचाई संसाधनों के विकास के साथ फसल सघनता में आशातीत वृद्धि हो रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0143 वर्तमान में जिले में गेहूं की खेती लगभग एक लाख हैक्टर क्षेत्रफल में की जा रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0144 धान-गेहूं फसल प्रणाली में ग्रीष्मकालीन मूंग का रकबा भी तेजी से बढ़ रहा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0145 धान की कटाई के बाद गेहूं की बुआई के लिए खेत की तैयारी करना श्रम साध्य, अधिक लागत के साथ ज्यादा समय चाहने वाली एक आवश्यक कृषि क्रिया है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0146 इसके साथ ही गेहूं की बुआई में अवांछित विलंब के कारण कम उत्पादन एवं ग्रीष्मकालीन फसलों की देरी से बुआई के कारण किसानों को बहुत कम उत्पादकता प्राप्त होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0148 जीरो टिलेज तकनीक के प्रभावी प्रदर्शन ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0150 किसानों की इस व्यावहारिक कठिनाई का समाधान कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा जीरो टिलेज तकनीक के प्रभावी प्रदर्शन एवं तकनीकी के प्रचार-प्रसार द्वारा संभव हो सका है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0151 गहरी काली भारी मृदाओं में धान की कटाई के उपरांत, परंपरागत ढंग से खेत की तैयारी करके आगामी गेहूं फसल की बुआई करने में 20 से 25 दिनों का समय लग जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0152 इसी प्रकार गेहूं की कटाई के उपरांत आगामी ग्रीष्मकालीन मूंग-उड़द के लिए खेत की तैयारी कर बुआई करने में 10 से 15 दिनों का समय लग जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0153 इस बहुमूल्य समय की बचत करने के लिए हैप्पी टर्बो सीडर का प्रयोग लाभकारी सिद्ध हुआ है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0154 हैप्पी टर्बो सीडर का प्रयोग करके जीरो टिलेज तकनीक से बुआई करने पर निजात मिलती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0156 -सिंचाई जल की बचत होती है एवं मृदा में संरक्षित नमी का बेहतर उपयोग होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0157 -खेत की तैयारी के लिए ट्रैक्टर में प्रयुक्त होने वाले डीजल की बचत होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0159 जीरो टिलेज तकनीकी प्रदर्शन से प्राप्त परिणामों का विश्लेषण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0161 केन्द्र द्वारा जिले के विभिन्न विकास खंडों में धान-गेहूं एवं धान-गेहूं-ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली में क्रमशः गेहूं एवं मूंग में हैप्पी टर्बो सीडर द्वारा जीरो टिलेज तकनीक से बुआई पर तकनीकी प्रदर्शन आयोजित किए गए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0162 इससे प्राप्त परिणाम सारणीवार प्रदर्शित हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0163 धान फसल कटाई के बाद गेहूं एवं ग्रीष्मकालीन मूंग विवरण। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0164 सारणी 1. धान फसल कटाई के बाद गेहूं एवं ग्रीष्मकालीन मूंग विवरण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0170 उपज (क्विंटल/हैक्टर) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0172 बुआई के लिए दिनों की बचत ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0174 सिंचाई जल की बचत/हैक्टर (एक सिंचाई एक इंच गहराई का जल) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0176 लाभःलागत अनुपात ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0178 जीरो टिलेज तकनीक का क्षैतिज प्रसार ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0180 सारणी 2. जीरो टिलेज तकनीक का क्षैतिज प्रसार ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0182 फसल ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0186 फसल किस्म तकनीक अंगीकरण वाले ग्रामों की संख्या ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0188 तकनीकी अपनाने वाले किसानों की संख्या ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0190 तकनीकी के अंतर्गत क्षेत्र (हैक्टर) औसत उपज (क्विं./ है.) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0192 शुद्ध लाभ (रुपये/ हैक्टर) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0194 लाभः लागत अनुपात ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0196 जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से परंपरागत पद्धति में प्रयुक्त होने वाले डीजल की बचत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0197 सारणी 3. जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से परंपरागत पद्धति में प्रयुक्त होने वाले डीजल की बचत ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0199 फसल प्रणाली ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0201 डीजल उपभोग ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0203 डीजल की बचत ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0205 परंपरागत ढंग से खेत की तैयार एवं बुआई-52(लीटर/हैक्टर) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0207 जीरो टिलीज तकनीक ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0209 जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से होने वाली सिंचाई जल बचत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0210 सारणी 4. जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से होने वाली सिंचाई जल बचत ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0214 सिंचाई जल की बचत ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0216 सिंचाई कार्य की लागत(रु./है) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0218 सिंचाई लागत में बचत (रुपये में) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0220 जीरो टिलेज तकनीक का धान-गेहूँ- ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली पर प्रभाव। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0221 जिले में तकनीकी अंगीकरण से धान-गेहूं (जीरो टिलेज तकनीक क्षेत्रफल-3550 हैक्टर), धान-गेहूं-मूंग (जीरो टिलेज तकनीक रकबा-2835 हैक्टर) फसल प्रणालियों में कुल 252207.5 लीटर डीजल की बचत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0223 सिंचाई जल संरक्षण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0225 तकनीकी अंगीकरण से धान-गेहूं-मूंग फसल प्रणाली में 5.795 करोड़ घनपफुट सिंचाई जल की बचत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0227 ऊर्जा संरक्षण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0229 जिले में सिंचाई के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले बहुमूल्य संसाधन विद्युत की 38310 किलोवाट की बचत। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0231 पर्यावरण पर दुष्प्रभाव में कमी ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0233 252207.5 लीटर डीजल की बचत से वायु प्रदूषण में कमी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0235 सामाजिक प्रभाव ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0237 धान-गेहूं-ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली अपनाने से एक फसल वर्ष में औसत 35 दिनों की बचत होने से किसानों के पास अन्य गतिविधियों के लिए समय की उपलब्धता। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0239 स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक :ए.के. सिंह, डी.के. सिंह, नितिन सिंघई, सिद्धार्थ नायक और मोनी थॉमस कृषि विज्ञान केन्द्र, जबलपुर, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्यप्रदेश)। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0241 Unnat-Kirshi-Taknik-Link8: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0243 जीरो बजट प्राकृतिक खेती ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0247 धरती में इतनी क्षमता है कि वह सब की जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने में वह सक्षम नहीं है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0248 महात्मा गांधी के सोलह आना सच्चे इस वाक्य को ध्यान में रखकर जीरो बजट प्राकृतिक खेती की जाये, तो किसान को न तो अपने उत्पाद को औने-पौने दाम में बेचना पड़े और न ही पैदावार कम होने की शिकायत रहे। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0249 लेकिन सोना उगलने वाली हमारी धरती पर खेती करने वाला किसान लालच का शिकार हो रहा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0251 कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस देश में रासायनिक खेती के बाद अब जैविक खेती सहित पर्यावरण हितैषी खेती,एग्रो इकोलोजीकल फार्मिंग,बायोडायनामिक फार्मिंग, वैकल्पिक खेती,शाश्वत कृषि,सावयव कृषि, सजीव खेती, सांद्रिय खेती, पंचगव्य, दशगव्य कृषि तथा नडेप कृषि जैसी अनेक प्रकार की विधियां अपनाई जा रही हैं और संबंधित जानकार इसकी सफलता के दावे करते आ रहे हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0253 परन्तु किसान भ्रमित है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0254 परिस्थितियां उसे लालच की ओर धकेलती जा रही हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0255 उसे नहीं मालूम उसके लिये सही क्या है ? ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0256 रासायनिक खेती के बाद उसे अब जैविक कृषि दिखाई दे रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0257 किन्तु जैविक खेती से ज्यादा सस्ती,सरल एवं ग्लोबल वार्मिंग (पृथ्वी के बढ़ते तापमान) का मुकाबला करने वाली “जीरो बजट प्राकृतिक खेती“ मानी जा रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0259 जीरो बजट प्राकृतिक खेती क्या है? ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0261 जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0262 एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0263 देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0264 इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0265 जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0266 जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0267 इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0268 फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0270 सफल उदहारण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0272 गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का ह्रास भी नहीं होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0273 इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0274 राजस्थान में सीकर जिले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साह वर्धक सफलता हासिल की है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0275 श्री सिंह के मुताबिक इससे पहले वह रासायिक एवं जैविक खेती करता था, लेकिन देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0277 प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की मानें तो जैविक खेती के नाम पर जो लिखा और कहा जा रहा है, वह सही नहीं है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0278 जैविक खेती रासायनिक खेती से भी खतरनाक है तथा विषैली और खर्चीली साबित हो रही है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0279 उनका कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती और जैविक खेती एक महत्वपूर्ण यौगिक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0280 वर्मीकम्पोस्ट का जिक्र करते हुये वे कहते हैं...यह विदेशों से आयातित विधि है और इसकी ओर सबसे पहले रासायनिक खेती करने वाले ही आकर्षित हुये हैं, क्योंकि वे यूरिया से जमीन के प्राकृतिक उपजाऊपन पर पड़ने वाले प्रभाव से वाकिफ हो चुके हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0282 पर्यावरण पर असर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0284 कृषि वैज्ञानिकों एवं इसके जानकारों के अनुसार फसल की बुवाई से पहले वर्मीकम्पोस्ट और गोबर खाद खेत में डाली जाती है और इसमें निहित 46 प्रतिशत उड़नशील कार्बन हमारे देश में पड़ने वाली 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के दौरान खाद से मुक्त हो वायुमंडल में निकल जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0285 इसके अलावा नायट्रस, ऑक्साइड और मिथेन भी निकल जाती है और वायुमंडल में हरितगृह निर्माण में सहायक बनती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0286 हमारे देश में दिसम्बर से फरवरी केवल तीन महीने ही ऐसे है, जब तापमान उक्त खाद के उपयोग के लिये अनुकूल रहता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0288 आयातित केंचुआ या देसी केंचुआ? ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0290 वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुओं को भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक मानने वाले श्री पालेकर बताते है कि दरअसल इनमें देसी केचुओं का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0291 आयात किया गया यह जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक जन्तु है, जो भूमि पर स्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को खाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0292 जबकि हमारे यहां पाया जाने वाला देशी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणु जो फसलों एवं पेड़- पौधों को नुकसान पहुंचाते है, उन्हें खाकर खाद में रूपान्तरित करता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0293 साथ ही जमीन में अंदर बाहर ऊपर नीचे होता रहता है, जिससे भूमि में असंख्यक छिद्र होते हैं, जिससे वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुर्नभरण हो जाता है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0294 इस तरह देसी केचुआ जल प्रबंधन का सबसे अच्छा वाहक है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0295 साथ ही खेत की जुताई करने वाले “हल “ का काम भी करता है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0297 सफलता की शुरुआत ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0299 जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0300 इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0301 प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुये आयातित । ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0303 स्त्रोत: पत्र सूचना कार्यालय,भारत सरकार ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0305 Unnat-Kirshi-Taknik-Link9: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0307 दक्ष खेती: सुनहरा भविष्य ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0311 वर्तमान युग की कृषि सम्बन्धी चुनौतियों का सामना करने के लिए दक्ष खेती एक उत्तम तकनीक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0312 यह खेती की एक एकीकृत प्रणाली है और प्रबन्धन छोटे से खेत में फसल की वास्तविक आवश्यकताओं पर आधारित है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0313 इस खेती की आदर्श परिस्थितियाँ यह है कि खेत काफी विस्तृत और विभिन्नताओं से युक्त होना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0314 दक्ष खेती की प्रमुख भाग निम्नलिखित है ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0316 भूमंडलीय स्थिति प्रणाली ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0318 यह एक उपग्रह आधारित दिशा सूचक प्रणाली है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0319 इसका रिसीवर मोबाइल हैण्डसेट जैसा दिखता है जो कि लगभग पांच मीटर तक की यथार्थता देने में सक्षम है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0321 सुदूर संवेदक ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0323 यह तकनीक दूर स्थान के आंकड़े अर्जित करती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0324 इस कार्य में इलेक्ट्रोनिक कैमरा, वायुयानों द्वारा सर्वेक्षण और उपग्रह की विशेष भूमिका होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0325 इस प्रणाली का प्रयोग आंकड़े बनाने में किया जाता है जिसका विश्लेष्ण भौगोलिक सूचना प्रणाली द्वारा होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0326 कच्चे आंकड़े संसाधित किए जाने के बाद प्रसंस्कृत चित्र क्षेत्र मानचित्र के निर्देशांक अनुरूप बनाए जाते हैं तत्पश्चात उसकी व्याख्या की जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0328 भौगोलिक सूचना प्रणाली ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0330 यह दक्ष खेती का प्रमुख भाग है व प्रबन्धन की एक तकनीक है जिसकी सहायता से हम एक ही बार में खेती की स्थिति का जायजा ले सकते है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0331 यह प्रणाली सही निर्णय देने में सहायक होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0333 स्वचलित कृषि प्रणाली ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0335 इस प्रणाली में कृषि संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वचालिताम यंत्रों द्वारा होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0336 दक्ष खेती को कार्यान्वित करने के लिए 50 से 60 एकड़ या उससे भी बड़े खेत को 2-3 एकड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित किया जाता है उसके पश्चात भूमंडलीय स्थिति प्रणाली द्वारा खेत का सर्वेक्षण करते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0337 प्रत्येक छोटे-छोटे खेतों के टुकड़ों का अवलोकन करने के बाद नमूने एकत्रित किए जाते हैं व उनका विश्लेष्ण होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0339 साधारणत: विश्लेष्ण निम्नलिखित लक्षणों को दर्शातें है ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0343 अम्लता मापक ऊपरी सतह की मिट्टी की गहराई, कठोर सतह, एन.पी.के और सूक्ष्म पोषक तत्व, फसल तत्व, रोग और कीट प्रतिरोधक क्षमता इत्यादि। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0344 इस प्रकार के अध्ययनों से खेत की अच्छी फसल हेतु आवश्यकताओं की सही जानकारी हो जाती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0346 विविधदर आधारित यह तकनीक स्थान सम्बन्धी पदार्थो के प्रयोग से अभिप्रेरित हैं जैसे की बीज, पादपनाशक, कीटनाशक, खाद और संशोधन। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0347 इसमें एक चलायमान को क्षेत्रीय कंप्यूटर, जी.पी.एस. रिसीवर, संबंधित प्रायोगिक मानचित्र उत्पाद चित्रण नियंत्रक द्वारा खेत की आवश्यकता के अनुरूप पदार्थ की मात्रा अथवा प्रकार में परिवर्तन किए जाते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0348 परिवर्तनीय गति तकनीक का अग्रिम रूप है – ओन-द-गो सैनसिंग। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0349 यह मानचित्र प्रयोग के माध्यम से भूमंडलीय स्थिति प्रणाली को निर्देशांकित करता है जो नियंत्रण विभाग पर कार्य करता है और सामग्री पर नियंत्रण रखता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0351 दक्ष खेती के कुछ लाभ इस प्रकार है ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0353 उच्च उत्पादन, कम लागत में अधिक लाभ, प्राकृतिक संसाधनों का प्रभावशाली इस्तेमाल, सीमित श्रम शक्ति, पर्यावरण सुरक्षा, उत्पादकता और अनुकूलतम लाभ। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0355 अमेरिका, इंगलैंड, कनाडा, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में यह तकनीक 1980 से चलन में है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0356 भारत में इस तकनीक को अपनाने के प्रमुख बाधक हैं – छोटे कृषि क्षेत्र और सीमित निवेश, परन्तु उन्नतिशील किसान, भू-भाग और उद्यान विज्ञान, अनुबंधित खेती, कृषि अर्थशास्त्रीय और नियति क्षेत्र में दक्ष खेती की स्वीकृति की आशा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0358 धनिया स्प्लिटर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0360 धनिया स्प्लिटरधनिया के बीज को बेहतर अंकुरण के लिए बोने से पहले दो भागों में तोड़ना पड़ता है तथा इसे माउथ फ्रेशनर के रूप में भी प्रोसेस किया जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0361 पारम्परिक रूप से बीजों को हाथ से तोड़ा जाता है तथा यह एक नीरस व काफी समय खर्च होने वाला काम है और इसके अलावा इसमें फ़सल की कटाई के बाद बीज की क्षति के कारण नुकसान होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0362 इसलिए यांत्रिक कार्य जरूरी हो जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0363 CIPHET में धनिया के बीजों को तोड़ने के लिए एक मशीन डिजाइन की गयी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0364 यह मशीन 1 एचपी के मोटर से चलती है, जिसकी क्षमता 60-80 किग्रा/घंटा है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0365 इस मशीन में 6.5 सेमी व्यास तथा 10 सेमी लंबे 2 रोलर होते हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0366 दो रोलरों को डिफरेंशियल स्पीड दी जाती है ताकि धनिया दो भागों में टूटकर अलग हो जाए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0367 स्प्लिटर में गियर टाइप की मीटरिंग होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0368 यह मशीन धनिए को 14.2% नमी की स्थिति में तोड़ने में सक्षम हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0370 Unnat-Kirshi-Taknik-Link10: ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0372 पैरा कृषि - कम लागत से ज्यादा आमदनी ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0376 हमारे देश में सदियों से दोहरी फसलोत्पादन की अनेकों कृषि पद्धतियाँ प्रचलन में हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0377 इनमें से बहुत ही प्रचलित तथा महात्वपूर्ण कृषि पद्धति है – पैरा कृषि वेगबवद्ध खेती। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0378 आधार फसल के कटनी से पूर्व अन्य फसल की बुआई आधरित फसल के खड़ी खेत में करना ही पैरा कृषि पद्धति या “वेगबद्ध” कहलाता है तथा अनुवर्ती फसल “पैरा फसल कहलाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0379 इस कृषि प्रणाली का मुख्य उद्देश्य खेत में मौजूद नमी का उपयोग अनुवर्ती पैरा फसल के अंकुरण तथा वृद्धि के लिए करना है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0381 झारखंड जैसे क्षेत्रों में जहां की कृषि वर्षा पर आधारित हैं तथा सिंचाई के सीमित साधन के कारण रबी मौसम में खेत परती पड़ी रहती है वैसे क्षेत्रों के लिए “पैरा कृषि” एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0383 पैरा कृषि पद्धति से प्राय: सभी किसान परिचित होंगे, लेकिन इनसे जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं तथा आधुनिक जानकारियों के अभाव के कारण उनका पैदावार काफी कम है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0384 अत: पैदावार बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों तथा जानकारियों का व्यापक उपयोग अति आवश्यक हैं। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0386 जमीन का चुनाव ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0388 पैरा खेती के लिए केवल या मटियार दोमट जैसी भारी मिटटी उपयुक्त होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0389 अत: मध्यम तथा निचला जमीन (दोन) का चुनाव करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0390 भारी मिटटी में जलसाधारण क्षमता होती है साथ ही काफी लम्बे समय तक मिटटी में नमी बरकरार रहती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0391 टांड या उपरी जमीन पैरा खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि यह जल्दी सूख जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0393 फसल का चुनाव ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0395 आधार फसल तथा अनुवर्ती पैरा फसल के बीच समय का सामंजस्य अति आवश्यक है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0396 दोनों फसलों के बीच समय का तालमेल इस तरह से हों कि हथिया नक्षत्र में पड़ने वाली वर्षा का लाभ दोनों फसलों को मिले साथ ही पैरा फसल की वृद्धि के लिए पर्याप्त समय भी मिले। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0397 अत: आधार फसल के लिए मध्यम अवधि वाली अर्थात 120 से 125 दिन में पकने वाली उन्नत प्रभेद का चुनाव करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0398 लम्बे अवधि वाले आधार फसल का चुनाव करने से पैरा फसल को वृद्धि के लिए कम समय मिला है तथा नमी के अभाव के कारण उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0400 इस पठारी क्षेत्र में धान ही मुख्य फसल है इसलिए धान को आधार फसल के रूप में लिया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0401 धान की उन्नत तथा मध्यम अवधि वाली किस्में जैसे – आई.आर.-36, आई.आर.-64, बिरसा धान-202, पूसा बासमती इत्यादि की खेती खरीफ में आधार फसल के रूप में की जानी चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0402 पैरा फसल के रूप में तीसी, मसूर, चना, मटर एवं खेसारी इत्यादि का चुनाव किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0406 पैरा फसल के लिए बीज दर उस फसल के सामान्य अनशंसित मात्र से डेढ़ गुणा अधिक होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0407 उदाहरण के लिए तीसी का अनुशंसित बीज दर 8 किलो प्रति एकड़ है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0408 पैरा खेती हेतु 8 किलो का डेढ़ गुणा (1.5) अर्थात 12 किलो तीसी प्रति एकड़ चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0409 प्रति क्षेत्रफल पैदावार बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों का चुनाव अत्यंत जरूरी है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0411 आधार फसल धान तथा पैरा फसलों के उन्नत किस्में तथा बीज दर ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0413 आधार फसल धान की किस्में ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0415 पैरा फसल ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0417 पैरा फसल की किस्में ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0419 बीज दर (किलो/एकड़) ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0421 कब और कैसे लगाएँ ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0423 धान में पचास प्रतिशत फूल आने के दो सप्ताह बाद अर्थात अक्टूबर के मध्य माह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच पैरा फसल का बुआई छींट कर करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0424 बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0425 नमी इतनी होनी चाहिए की बीज गीली मिटटी में चिपक जाये। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0426 जहाँ ध्यान दें कि खेत में पानी अधिक न हो अन्यथा बीज सड़ जाएगी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0427 आवश्यकता से अधिक पानी को निकाल दें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0428 जल निकासी का उचित व्यवस्था रखें। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0430 खाद एवं उर्वरक ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0432 दलहनी फसलों में नेत्रजन (नाइट्रोजन) की आवश्यकता पौधे के प्रारम्भिक अवस्था में होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0433 अत: यूरिया 2 किलो, डी.ए.पी.20 किलो तथा पोटाश 6 किलो प्रति एकड़ बुआई के समय देना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0434 4 क्विंटल गोबर खाद भी अच्छी तरह से भूरकाव कर देना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0435 तीसी या अन्य तिलहनी फसलों के लिए नेत्रजन की अतिरिक्त मात्रा देने की आवश्यकता होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0436 अतिरिक्त 10 किलो यूरिया का व्यवहार बुआई के 20 दिन बाद करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0440 धान कटनी के 40-45 दिन बाद पैरा फसल में एक निकौनी करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0441 तीसी में खरपतवार नियंत्रण के लिए आइसोप्रोटोरान धूल (25 प्रतिशत) का छिड़काव बुआई के 15 दिनों बाद किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0442 दलहनी फसलों में खरपतवार नियंत्रण हेतु एलाक्लोर 50 ई.सी. का प्रयोग बुआई के 2 दिन बाद किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0444 पौधा संरक्षण ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0446 दलहनी फसलों जैसे चना, मटर, मसूर, खेसारी तथा तिलहनी फसल तीसी में उकठा रोग होने पर उक्त खेत में 2 से 3 साल तक इन फसलों की खेती रोक देनी चाहिए अथवा रोग रोधी किस्मों का व्यवहार करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0447 मटर के फफूदी रोग नियंत्रण हेतु कैराथेन (0.1 प्रतिशत) या सल्फेक्स (0.3 प्रतिशत), इंडोफिल एम-450 0.2 प्रतिशत के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0448 तीसी में गोल मीज का प्रकोप होने पर मिथाइल डियेटोन (10 मिली./10 ली.पानी) या मोनोक्रोढ़ोफास (10 मिली/10 ली. पानी) का छिड़काव करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0449 दलहनी फसलों में फली छेदक नियंत्रण हेतु डेल्फिन या डिपेल (1 ग्राम/ली.पानी) या इंडोसल्फान तरल (1.2 मिली./ली.पानी) का छिड़काव करना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0453 किसान भाई अगर आधार फसल धान जैसा ही पैरा फसल के खेती पर ध्यान दें तो निश्चित रूप से प्रति क्षेत्रफल पैदावर बढ़ेगी। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0454 पैरा कृषि अपनाकर काफी कम लागत में निम्नलिखित उपज प्रति एकड़ प्राप्त किया जा सकता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0458 पैरा कृषि के अंतर्गत कुछ सावधानियाँ बरतने की आवश्यकता होती है, जैसे – ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0460 1-अंकुरण के समय खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0461 पानी के जमाव से बीज के सड़ जाने का खतरा रहता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0462 अत: जल निकासी का उचित व्यवस्था करके रखना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0464 2-बीज बुआई के समय फसल, किस्म तथा मिटटी के प्रकार का ध्यान देना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0466 3-आधार फसल के बुआई के समय ही पैरा खेती के लिए भी योजना बना लेना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0468 4-आधार फसल मध्यम अवधि वाली उन्नत किस्म की होनी चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0470 5-आधार फसल का कटाई पैरा फसल को बचाते हुए बड़ी सावधानी से की जानी चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0472 6-चना तथा खेसारी जैसी पैरा फसल की शीर्षक शाखाओं को तोड़ देना चाहिए। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0474 पैरा खेती से लाभ ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0476 पैरा खेती के निम्नलिखित लाभ है- ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0478 1- पैरा कृषि अन्य दोहरी कृषि पद्धतियों से कम लागत वाली सस्ती कृषि पद्धति है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0480 2- इस कृषि पद्धति से खेत में मौजूद नमी का पूर्ण उपयोग हो जाता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0482 3- कम लागत से ही दलहन तथा तिलहन का अतिरिक्त उपज प्राप्त होता है, अर्थात अधिक लाभ प्राप्त होता है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0484 4- पैरा कृषि के अंतर्गत दलहनी फसलों के खेती से मिटटी में नेत्रजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे किसान को अनुवर्ती अन्य फसल के खेती में नेत्रजनीत खाद की कम मात्रा देनी पड़ती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0486 5- तेलहनी फसलों से खल्ली के रूप में कार्बनिक खाद की प्राप्ति होती है। ebs_Unnat-Kirshi-Taknik-Link_5-10-translation-hin2tel_0488 6- पैरा कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि रबी मौसम में जो खेत परती रहता है, उसका समुचित उपयोग हो जाता है।