ID SENT ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0001 खासी संतरा फसल पैदावार और प्रबंधन के तरीके ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0003 बगीचा के लिए स्‍थल चयन। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0004 -वहाँ सूर्य की पर्याप्‍त रोशनी हो। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0005 -खड़ी ढलान, उथली भारी मिट्टी के इस्‍तेमाल से बचना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0007 मौसम। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0008 -उष्णकटिबंधीय-समशीतोष्ण जलवायु -उच्च आर्द्रता और तेज गर्म एवं हल्की सर्दी वाला मौसम मिट्टी- पीएच 5.5 से 6.5 तक, सही तरीके की निकासी व्‍यवस्‍था, मिट्टी की मध्‍यम गहराई ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0010 प्रसारण (वंश वृद्धि) बीज। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0011 -स्‍वस्‍थ, उच्‍च गुणवत्‍ता वाले, बीमारी मुक्‍त और कीटनाशक मुक्‍त पौधों को बीजों के लिए चुना जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0012 -बीज निकालने के बाद नर्सरी में उन्‍हें तुरंत बोया जाना चाहिए (सप्ताह भर के भीतर)। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0013 -नर्सरी में बीज 1.5 से 2 सेंटीमीटर की गहराई और 10 X 5 सेंटीमीटर के अंतराल पर बोने चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0014 -4 से 6 पत्‍तों के होने पर पौधों को दूसरी क्‍यारी या पॉलिथीन बैग में लगा देना चाहिए जहाँ समान मात्रा में मिट्टी, रेत और कृषि खाद पड़ी हो। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0015 -अब वे मुख्‍य खेत में रोपण के लिए तैयार हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0016 12 से 18 महीने के बाद उनकी कलम निकाली जा सकती है ओर वे फूलने के लिए तैयार होंगे। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0017 -रोपण के लिए चुनी गई पौधे मजबूत, स्‍वस्‍थ और कीटनाशक मुक्‍त, बीमारियों से मुक्‍त और 60 से 90 सेंटीमी‍टर की ऊंचाई तक होनी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0019 फूल आनाः फरवरी-मार्च या जुलाई-अगस्‍त। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0020 रूट स्‍टॉकः रफ लेमन। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0021 -रूट स्‍टॉक में जमीन से 15-20 सेमी ऊपर टी के आकार का कट लगाया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0022 -इसके दोनों फ्लैप को ढीला किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0023 -मुख्‍य पौधे से 2.5 सेंटी मीटर की लंबाई वाला कली का हिस्‍सा निकाल लिया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0024 -इस कली को रूट स्‍टॉक के टी आकार वाले हिस्‍से में डाल दिया जाता है और उसे 400 गॉज की पालिथिन या हेसियन कपड़े से बांध दिया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0026 रोपणरोपण का समय: जून से अगस्‍त ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0028 पौधों से पौधों के बीच की दूरी: 5 X 5 मीटर ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0030 गड्ढे का आकार: 0.75 X 0.75 X 0.75 मीटर ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0032 गड्ढे का भराव ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0034 -10 सेंटीमीटर मिट्टी, 15-20 किलो कृषि खाद, 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश यूरिया, 300 जी एसएसपी, 100 ग्राम क्‍लोरोपाइरिफॉस की धूल या कण ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0036 -कलम को जमीन से 15 सेंटी मीटर ऊपर रखा जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0037 -पौधे के गड्ढों में रोपण से पहले पौधे की जड़ों को रिडोमिल एमजेड-72 एट 2.75 ग्राम/लीटर प्‍लस बाविस्तिन 1 ग्राम/लीटर मिश्रण में भिगोना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0038 -उसे जमीन स्‍तर से 10 सेंटीमीटर ऊपर तक भरा जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0040 पैदावार के बीच में रोपण। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0041 -फ्रेंच बीन, राइस बीन और अन्‍य सब्जियों को बीच में बोया जा सकता सकता है (1 से 5 साल)। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0043 खाद ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0045 -दो साल से अधिक के दौरान प्रति पौधे 5 किलो राख व भूसी (फार्मयार्ड मैन्यूर, एफवाईएम) का छिड़काव किया जाना चाहिए और प्रत्‍येक साल इसमें 5 किलो की मात्रा बढ़ा दी जानी चाहिए और छठें साल 25 किलो प्रति पेड़ पर छिड़काव किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0046 -सूक्ष्म और स्थूल (वृहत्) पो‍षक तत्‍वों का प्रयोग मिट्टी के नमूना परीक्षण या विशेषज्ञों की सिफारिशों को ध्‍यान में रखकर किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0048 छंटाई ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0050 -पहले साल के दौरान जमीन के स्‍तर से सभी शाखाओं की लंबाई 50 सेंटीमीटर तक बढ़नी चाहिए और उसके बाद आधी मीटर साफ, सीधी शाखाओं को छोड़कर अन्‍य की छंटाई की जानी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0051 -सभी अतिरिक्‍त शाखाओं की छंटाई पहले साल के दौरान महीने में एक बार की जानी चाहिए और उसके बाद प्रत्‍येक दो या तीन महीनों में की जानी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0052 -जिन पेड़ों में फल लग रहे हों, उनमें नम, सूखी और बीमारी लगी हुई शाखाओं की छंटाई साल में एक बार या दो बार की जानी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0053 -जिनमें फल न लग रहे हों, उनकी छंटाई किसी भी समय की जा सकती है, लेकिन फलदार पेड़ों में कटाई के तुरंत बाद छंटाई की जानी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0055 सिंचाई- दिसम्‍बर से मार्च, 15 से 20 दिन के अंतराल पर। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0057 फ्रूट ड्रॉप ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0059 -कली के चरण पर 2, 4-डी 1 किलो प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव तथा कटाई से तुरंत पहले 100 लीटर पानी में 2 किलो या मार्च से अप्रैल तथा अगस्‍त से सितम्‍बर महीने में 5 लीटर पानी में 1 मिली लीटर प्‍लानो फिक्‍स का छिड़काव किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0060 -संतरा तना छेदक (एनोप्‍लोफोरा वर्सटीजी) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0064 -शाखाओं/पेड़ों के आधार में धूल दिखाई देती हो। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0065 -तने में गोल छेद ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0067 प्रबंधन ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0069 -अप्रैल से जुलाई के दौरान पके हुए को इकट्ठा करना और उन्‍हें नष्‍ट करना -एंडोसल्‍फान/मोनोक्रोटोफास के साथ चूना और पानी 1:10:100 के अनुपात में। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0070 -तामचीनी या दंतवल्क पेंट के एक लीटर में 3 मिलीलीटर मोनोक्रोटोफास मिलाकर तने पर 1 मीटर तक अप्रैल से जून के बीच दो बार छिड़काव किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0071 -अप्रैल से जुलाई के दौरान तीन बार नीम की दवा का छिड़काव (प्रति लीटर पानी में 4 मिलीलीटर या एंडोसल्‍फान (0.70 फीसदी) या मोनोक्रोटोफास (0.05 फीसदी) या क्‍वीनालफोस (0.05) का। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0072 -तने में 10 मिली लीटर का छेद कर उसमें मोनोक्रोटोफास (0.07 प्रतिशत) या डायक्‍लोरवोस (0.05 फीसदी) का इंजेक्‍शन मई से अक्‍टूबर के बीच में दिया जाना चाहिए और इस इंजेक्‍शन के बाद छेद को मिट्टी से बंद कर दिया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0073 -चींटियों की मौजूदगी को प्रोत्‍साहन दें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0074 -संक्रमित पौधे के छेद को लोहे की तार की मदद से साफ करें और फिर उसके भीतर पेट्रोल या डायक्‍लोरवोस में भिगोई रूई को डालें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0076 फल चूसक कीड़ा (ऑथेरेसिस फुलोनिका) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0080 -फलों का पिचकना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0081 -पिचके हुए क्षेत्र का मुलायम और गुदगुदा हो जाना ओर तेज गंध हो जाना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0082 -नुकसान पहुंचे हुए फलों का परिपक्‍व होने से पहले ही गिर जाना ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0086 -बगीचों को धुआँ दिखाना (शाम से पहले आधा घंटा से लेकर दो-तीन घंटे तक)। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0087 -पकने से पहले नीम की दवा का छिड़काव प्रति लीटर पानी में 4 मिली लीटर या 2 प्रतिशत मछली के तेल से बना साबुन उस पर लगा दें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0088 -नुकसान हुए फलों को नियमित रूप से इकट्ठा करना और उन्‍हें गहराई में गाड़ देना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0089 -कीट को पकड़कर जहर देकर मार देना (10 लीटर पानी में 1 किलो चीनी और 50 मिली लीटर डाइक्‍लोरवॉस मिलाकर)। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0090 -एक हेक्‍टेयर क्षेत्र में जहर की 20-30 थैलियां लटका दी जानी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0091 -संतरा पत्ती छेदक (फिलोक्निसटिस सिट्रेला)लक्षण। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0092 -नाजुक पत्‍तों पर लार्वा का पलना, ऊपरी सतह को खाना और पत्‍ते पर टेढ़े-मेढ़े रास्‍ते बनाना जिससे पत्‍ती पीली पड़कर सूख जाती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0096 -सर्दी के दौरान प्रभावित क्षेत्र को छाँटकर उसे जलाना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0097 -नीम की दवा का 2 फीसदी छिड़काव करना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0098 -0.05 फीसदी मोनोक्रोटोफास या 0.01 फीसदी फेनवालेरेट का छिड़काव करना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0100 एफिड (टोक्‍सोटेरा ओरांटी)लक्षण। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0101 -नाजुक पत्‍तों की निचली सतह, तने और ताजा फलों को संक्रमित कर देता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0102 -संक्रमित भाग मुड़ जाता है और फल अपने आप नीचे गिर जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0105 -नीम के तेल या नीम के बीज के 2 प्रतिशत अर्क का छिड़काव करना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0107 बीमारियों का प्रबंधन। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0108 संतरा कीड़ी (जांथोमोनाज कम्‍पेसट्रिस पीवी सिट्री) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0110 लक्षण -बीज, पत्‍तों और फलों पर पीले रंग के धब्‍बे प्रकट हो जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0112 प्रबंधन -15 दिनों के अंतराल पर 1 प्रतिशत बोर्डाउ मिश्रण, 500 से 1000 पीपीएम स्‍ट्रेप्टोमाइसिन सल्‍फेट का छिड़काव करना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0113 धूमल (कालारुण) फफूँद (कैपनोडियम एसपी)। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0115 लक्षण -पत्‍तों, फलों और फलियों पर काले धब्‍बे प्रकट हो जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0118 -मछली के तेल, धूप साबुन या कच्‍चे तेल के घोल और माड़ी के मिश्रण को (250 ग्राम: 250 ग्राम: 250 ग्राम के अनुपात में) पौधे पर छिड़काव करना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0119 -गाय के मूत्र का छिड़काव करने से भी धब्‍बों को कम किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0120 -नीला व हरा फफूँद (पेनीसिलियम इटैलिकम)लक्षण। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0121 -पहले फफूँद होता है और वे जैसे-जैसे फल पर बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका रंग नीले या हरे रंग में बदल जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0123 प्रबंधन -कटाई के 24 घंटों के अंदर इमे‍जेलिल का छिड़काव किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0125 लोरेंथस (लोरेंथस एसपी) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0129 -पेड़ की एक या अधिक टहनियों पर गुच्‍छेदार परजीवी पैदा हो जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0133 -प्रभावित क्षेत्र की छंटाई करना और परजीवी का उन्‍मूलन करना। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0135 इस संबंध में अधिक जानकारी हेतु नीचे संपर्क करें- ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0137 श्री आर. श्रवणन ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0139 ई आरिक (ई-कृषि) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0141 कृषि विस्‍तार के लिए आईसीटीग्राम ज्ञान केन्‍द्र, यागरूंग गांव,पासीघाट, पूर्वी सियांग जिला, ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0143 फोन नंबर- 2282323 ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0145 वेबसाइटः www.agriculturesnetwork.org ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0147 खासी संतरा कटाई के बाद का प्रबंधन ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0149 संतरा को तोड़ने के बाद रख-रखाव (प्रबंधन)संतरा को तोड़ने के बाद होने वाली क्षति को रख-रखाव और संग्रहण की उपयुक्‍त तकनीक अपनाकर कम किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0151 फसल पकने के संकेत ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0153 संतरा को पूरी तरह पकने के बाद तोड़ा जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0154 बहुत जल्‍दी तोड़ने से फलों में चिलिंग इंजरी यानी प्रशीतन के कारण हुई क्षति पैदा हो जाती है और देरी से तोड़ने से नमी वाली परिस्थितियों में उसके संग्रहण की वजह से फल का रूप बिगड़ जाता है या फिर वे फूल जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0155 सामान्‍यत: संतरा को तोड़ने के समय का निर्धारण उसके छिलके के रंग के आधार पर किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0156 जब फल का 75 फीसदी या उससे अधिक भाग का रंग संतरी हो जाता है, तो यह फल के पकने और उसके तोड़ने के उपयुक्त हो जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0157 रस में कुल घुलनशील ठोस सामग्री (टीएसएस), एसिड और टीएसएस/एसिड के अनुपात को फल के पकने का आंतरिक लक्षण माना जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0158 रस में टीएसएस 8.5 प्रतिशत या इससे अधिक होना चाहिए जो छोटे रिफ्रैक्‍टोमीटर द्वारा निर्धारित किया गया हो। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0159 रस में टीएसएस के साथ 0.3-0.4 प्रतिशत अम्‍लता भी होनी चाहिए या टीएसस व एसिड का अनुपात 6.5 प्रतिशत होना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0161 तोड़ने के तरीके ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0163 संतरा कटाई के दौरान बहुत ही संवेदनशील होते हैं और तोड़ने की सही तकनीक से इसे होनेवाले नुकसान को कम किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0164 नारंगी को चाकू, दरांती या क्लिपर से काटना सबसे अच्‍छा होता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0166 पारंपरिक तरीके के लिए फल को सावधानीपूर्वक मोड़ कर झटके से खींच कर तोड़ते हुए अपनी कलाई को इस तरह से घुमाना चाहिए ताकि डंठल फल के साथ जुड़ा रह सके। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0167 फल के साथ जो टहनी टूट जाती है, उसे काट देना चाहिए क्‍योंकि वे आपके फल में छेद कर सकती हैं या नुकसान पहुंचा सकती है और उससे फल सड़ सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0168 पेड़ों को हिलाना नहीं चाहिए क्‍यों‍कि इससे फल जमीन पर गिर सकते हैं जिससे उन पर चोट लग सकती है जिससे कटाई के बाद नुकसान हो सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0169 कटाई के बाद फल को गद्देदार टोकरी में इकट्ठा करना चाहिए या उन्‍हें प्‍लास्टिक की ऐसी टोकरी में रखना चाहिए जिसमें हवा के लिए पर्याप्‍त जगह हो। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0170 इकट्ठा करने वाली टोकरियाँ या तो आपकी कमर से बंधी होनी चाहिए या आपके कंधों से और वे ऐसी होनी चाहिए जिससे वे नीचे से आसानी से खुल सकें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0171 जब इकट्ठा करने वाली टोकरी भर जाती है, तो पेड़ से एक रस्‍सी की मदद से उसे बड़े कंटेनर में सावधानीपूर्वक खाली किया जाना चाहिए ताकि उन्‍हें कोई नुकसान न हो। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0173 संतरा की कटाई सुबह 9 बजे से दिन के 3 बजे तक की जानी चाहिए क्‍योंकि यह उसके बदरंग होने की आशंकाओं को कम करता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0174 कटाई सूखे मौसम में की जानी चाहिए और तोड़े हुए फलों को तुरंत ही छायादार और ठंडे स्‍थान पर रख दिया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0176 बाजार के लिए तैयारी ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0178 सफाई ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0180 फलों पर से मिट्टी या अन्‍य जो भी पदार्थ लगा हुआ हो, उसे अच्‍छी तरह से साफ कर दिया जाना चाहिए क्‍योंकि ग्राहकों की साफ उत्‍पाद की मांग रहती है और इससे उगाने वालों को अच्‍छा मूल्‍य भी मिलता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0181 सफाई हाथ से रगड़कर सामान्‍य तरीके से की जा सकती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0182 इसके लिए फल को कुछ मिनटों तक सोडियम हाइपोक्‍लाराइट या क्‍लोरीन मिले हुए पानी में कुछ देर भिगोकर रख दिया जाना चाहिए और उसके बाद उन्‍हें दूसरे टैंक में सामान्‍य पानी में डाल कर निकाल कर साफ कर दिया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0183 फलों को मशीन से भी साफ किया जा सकता है जिसमें नारंगी पर रोलर के जरिए ब्रश और स्‍प्रे किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0184 फलों को जितना संभव हो सके, उतना कम पानी के भीतर रखना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0185 यदि फलों को अधिक दिनों तक संग्रह करके रखा जाना हो, तो फंगसरोधी के बतौर हाई-प्रेशर स्‍प्रे या इमेजालिल का इस्‍तेमाल किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0187 पैकिंग ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0189 संतरा को ऐसे बक्सों में रखा जाना चाहिए जो पर्याप्‍त हवादार हो और जिसमें फल आपस में एक-दूसरे से टकराएं नहीं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0190 सामान्‍यतौर पर घरेलू बाजार के लिए इस्‍तेमाल होने वाले कंटेनरों में 30 किलो फल आ जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0191 हालांकि, वे चोट के खतरे और एक-दूसरे से टकराने के खिलाफ फलों को पर्याप्‍त सुरक्षा उपलब्‍ध नहीं कराते। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0192 लकड़ी के कंटेनर फलों को अच्‍छी सुरक्षा देते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0193 निर्यात के लिए जिन कंटेनरों को प्राथमिकता दी जाती है वे फाइबर के बने होते हैं या फ्लिप-ऑन प्‍लास्टिक क्रेट होते हैं जिनमें 20 किलो फल आते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0194 पैकिंग के लिए सील पैक की आधुनिक तकनीक का इस्‍तेमाल किया जाता है या एक-एक फल को 0.01 एचडीपीई के हिसाब से श्रिंक पैक किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0196 छिलके के हरेपन को हटाना ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0198 इथीलीन को नारंगी के छिलके के हरेपन को दूर करने और उसका रंग बेहतर बनाने में इस्‍तेमाल किया जाता है क्‍योंकि यह निर्यात बाजार के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0199 इथीलीन फल के स्‍वाद पर कोई फर्क नहीं डालता। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0200 छिलके के हरेपन को दूर करने की प्रक्रिया में हरे छिलके वाले फल को कम इथीलीन में 20 से 25 डिग्री सेल्सियस पर कुछ दिनों के लिए रखा जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0201 इस इथीलीन का आरएच 90 फीसदी होना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0202 अंदर अच्‍छी हवा की आवाजाही की जरूरत होती है ताकि हरेक 2 से 3 मिनट में हवा आ-जा सके। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0203 ट्रीटमेंट चैम्‍बर में कार्बन डाइ ऑक्‍साइड का स्‍तर 2000 पीपीएम से अधिक नहीं होना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0204 फलों के हरेपन को दूर करने की प्रक्रिया से पहले उन्‍हें धोना नहीं चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0205 लिक्विड इथीलीन का उत्‍सर्जन करने वाले इथीफोन या थायाबेंडाजोल (1000 पीपीएम) या बेनोमिल (500 पीपीएम) का प्रयोग उन बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है जो फसल की कटाई के बाद नुकसान की सबसे बड़ी वजह होती हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0206 sफलों को इकट्ठा करने वाले बक्‍सों या कंटेनरों को बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए 6 से 8 फीसदी बोरैक्‍स से साफ किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0207 फलों पर लगे अतिरिक्‍त पानी को उन्‍हें तेज गति वाली ताजा हवा में रख कर अथवा टिश्‍यू पेपर या मुलायम कपड़े से पोंछ कर हटाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0209 श्रेणीकरण/छंटाई ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0211 आकार, छिलके के रंग, नुकसान या सड़न के हिसाब से नारंगी का श्रेणीकरण किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0212 इसी के अनुसार उन्‍हें चॉयस, रेगुलर, प्‍लेन और प्रसंस्‍करण का नाम दिया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0213 छोटे स्‍तर पर श्रेणीकरण और छंटाई हाथों द्वारा ही की जा सकती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0214 बड़े स्‍तर पर पैकिंग हाउस में इसे मशीनों द्वारा किया जा सकता है जहां नारंगी को आकार के हिसाब से छांटने वाले कनवेयर पर लोड किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0215 एक आकार के फलों को एक कंटेनर में भरा जाता है जबकि दूसरे आकार के फलों को अन्‍य कंटेनर में। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0217 वैक्सिंग ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0219 फलों की सफाई के दौरान अधिकतर प्राकृतिक वैक्‍स छिलके के ऊपर से हट जाती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0220 वैक्सिंग फलों के पकने, मुरझाने, नमी की कमी को रोककर छिलके की चमक को बढ़ा देती है जो उन्‍हें नुकसान पहुंचने से बचाती हैं और जिससे उनकी बाजार में रहने की अवधि भी बढ़ जाती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0221 फोम वैक्सिंग के तरीके से फलों पर वैक्सिंग की जा सकती है जिसमें कोटिंग या डुबाने की भी सुविधा होती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0222 इसमें एक द्रव्‍य के भीतर मोम को घोल कर फलों पर या तो छिड़का जा सकता है या ब्रशिंग विधि से लगाया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0223 वैक्सिंग न तो अधिक मोटी और न ही अधिक पतली। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0224 उसे तुरंत अच्‍छी तरह से सुखा लिया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0225 140 किलो नारंगी पर 500 पीपीएम के अनुपात में कार्नोबा वैक्‍स, पॉली इथीलिन इमल्‍शन या सुक्रोज ईस्‍टर कोटिंग्‍स के जरिए वैक्‍स करने के लिए कमरे के तापमान पर फलों को इनमें मिश्रण वाले पानी से भरे टैंक में एक-एक मिनट तक भिगोना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0227 तापमान प्रबंधन ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0229 कटाई के बाद नारंगी को रखने के लिए 2 से 3 डिग्री सेल्सियस का तापमान सर्वोत्‍तम होता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0230 इस तापमान पर उनकी बाजार की अवधि 4 महीने तक बढ़ सकती है जो कटाई के समय फलों की परिपक्‍वता पर निर्भर करती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0231 लघु अवधि यानी कुछ हफ्तों के संग्रहण के लिए 10 डिग्री सेल्सियस तापमान पर्याप्‍त होता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0232 अधिक तापमान पर फलों का संग्रहण करने से नमी में कमी, स्‍वाद में कड़वापन और सड़न भी तेजी से होगी। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0233 अधिक तापमान और आर्द्रता में संग्रहण के कारण तीन सप्ताह में नारंगी के छिलके में 10 फीसदी नमी की कमी हो सकती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0234 नारंगी को 85 से 90 प्रतिशत की आर्द्रता में संग्रहित किया जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0235 कम आरएच पर रखने से छिल्‍के पतले, सूखे और मुरझा जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0237 कटाई के बाद की प्रमुख बीमारियाँ ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0239 कटाई के बाद की सड़न को कटाई के पहले और कटाई के बाद फंगसरोधी के इस्‍तेमाल, धुलाई वाले पानी की साफ-सफाई, संग्रहण करने के तापमान और आरएच परिस्थितियों पर ध्‍यान देकर कम किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0241 हरा फफूँद ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0243 ग्रीन मोल्‍ड कटाई के बाद आमतौर पर नारंगी में होने वाली बीमारी है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0244 इस बीमारी के होने पर शुरुआत में फलों के छिलके पर मुलायम, पानी वाले रंगहीन धब्‍बे दिखाई देने लगते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0245 इसके बाद ये धब्‍बे 2.5 सेंटीमीटर तक फैल जाते हैं जो उस स्‍थान के अंदर सफेद फंगस पैदा करते हैं और रेशों को मुलायम कर देते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0247 नीला फफूँद ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0249 ब्‍लू मोल्‍ड के लक्षण भी ग्रीन मोल्‍ड से मिलते-जुलते होते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0250 इसमें सिर्फ फंगस लगे छेदों का रंग बदल जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0251 10 डिग्री से नीचे नीला मोल्‍ड बेहतर वृद्धि। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0252 ब्‍लू मोल्‍ड बंद कंटेनरों में फैलता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0254 तने का सूखना ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0256 तने के अंत में सड़न विभिन्‍न फंगस प्रजातियों द्वारा पैदा होती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0257 इसमें सड़न तब शुरू होती है जब फल और तने के बीच का हिस्‍सा पानी को सोख लेता है जो भूरा होकर पूरे तने पर फैल जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0258 प्रभावित कोशिकाएं सिकुड़ जाती हैं और सड़े हुए व स्‍वस्‍थ छाल के बीच एक स्‍पष्‍ट रेखा दिखाई देने लगती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0259 सड़न की यह प्रक्रिया या तो छाल के नीचे फैलती है या भूरी कोशिकाएं अंगुली जैसी आकृति में फैल जाती हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0260 कटाई के बाद इस रोग से बचने के लिए 2,4-डी, 500 पीपीएम का प्रयोग किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0262 कटाई के बाद की बीमारियाँ ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0264 ऑलियोसेलोसिस (ऑयल स्‍पॉटिंग) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0266 छिल्‍के को नुकसान होने पर कभी-कभार तेल की ग्रंथियां क्षतिग्रस्‍त हो जाती हैं जिसके परिणाम के तौर पर ऑयल स्‍पॉटिंग यानी तैलीय धब्‍बे पैदा हो जाते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0267 निकला हुआ तेल छिल्‍के की कोशिकाओं को मार देता है जिसके बाद वह फल के छिलके पर भूरा होकर दाग का रूप ले लेता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0268 सुबह के समय या ओस में कटाई नहीं करनी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0269 बारिश के बाद 2 से 3 दिन बाद जब फलों का छिलका पूरी तरह सूख जाए, ऐसे समय में फलों को सूती दस्‍ताने पहन कर गद्देदार कंटेनर का इस्‍तेमाल कर तोड़ा जाना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0270 इससे ऑयल स्‍पॉटिंग को फलों पर लगने से रोका या कम किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0272 स्टेम-एंड रिंड ब्रेकडाउन (एसईआरबी) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0274 स्‍टेम एंड रिंड ब्रेकडाउन फलों और तने को जोड़ने वाले हिस्‍से का खराब होना है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0275 छाल में नमी की अत्‍यधिक कमी के चलते कोशिकाएं खराब हो जाती हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0276 एसईआरबी की घटनाओं को रोकने के लिए सूखे मौसम में कटाई से पहले सिंचाई करनी चाहिए या फलों पर वैक्सिंग की जानी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0278 चिलिंग इंजरी (सीआई) ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0280 संतरा चिलिंग इंजरी के प्रति संवेदनशील होती हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0281 यह कम तापमान पर संग्रहण के दौरान विकसित होती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0282 चिलिंग इंजरी के लक्षणों में गंदे धब्‍बे, छिलके पर भूरे धब्‍बे आदि होते हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0283 चिलिंग इंजरी की घटनाओं को संग्रहण से पूर्व वैक्सिंग, फिल्‍म पैकेजिंग और/या इथीलीन और CO2 के ट्रीटमेंट से रोका जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0285 अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें: ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0287 डॉ.सुरेश तिवारी,एसिस्‍टेंट प्रोफेसर(पोस्ट हार्वेस्ट टेक्‍नोलॉजी), ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0289 बागवानी और वानिकी कॉलेज,केंद्रीय कृषि विश्‍वविद्यालय, पासीघाट- 791102, अरुणाचल प्रदेशफोन नंबर (कार्यालय): 0368-2224887 ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0291 बोरडॉक्स मिश्रण का निर्माण ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0293 कॉपर सल्फेट तथा चूना के मिश्रण को बोरडॉक्स मिश्रण के नाम से जाना जाता हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0295 1 प्रतिशत बोरडॉक्स मिश्रण का निर्माण ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0297 1. प्लास्टिक की बाल्टी में 50 लीटर जल में एक किलोग्राम कॉपर सल्फेट घोलें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0299 2. दूसरे प्लास्टिक की बाल्टी में 50 लीटर जल में एक किलोग्राम अनबूझा चूना घोलें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0301 3. कॉपर सल्फेट के घोल को लकड़ी की छड़ी से सतत रूप से हिलाते हुए चूना-जल में उड़ेलें। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0303 यदि निर्मित मिश्रण अम्लीय श्रेणी में है तो इसे उदासीन या क्षारीय स्थिति के निकट मिश्रण में कुछ और चूने का घोल मिलाकर लाया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0304 मिश्रण की उदासीनता की जांच के लिए पूर्णतया परिमार्जित चाकू या दराँती को कुछ मिनटों के लिए मिश्रण में डुबोएं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0305 यदि चाकू/दरांती पर लाल निक्षेप दिखता है तो यह मिश्रण के अम्लीय प्रकृति को दर्शाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0306 बोरडॉक्स के मिश्रण को ताजा स्थिति में हीं छिड़कना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0307 खड़ी स्थिति में इसका भंडारण न करें, यह अपना फफूंदनाशक गुण खो देता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0308 यद्यपि, मिश्रण के 100 लीटर में 1 किलोग्राम की दर से चीनी या गुड़ मिलाकर इसे स्थिर किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0309 स्थिर मिश्रण 3-5 दिनों तक नहीं बिगड़ता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0313 सावधानी ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0315 -घोल लकड़ी या मिट्टी या प्लास्टिक के बने बर्तन में ही निर्मित होना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0316 धातु के बर्तन में इसके निर्माण से बचें क्योंकि धातु के बर्तनों के लिए यह क्षयकारी होता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0318 -हमेशा कॉपर सल्फेट के घोल को ही चूने के घोल में मिलाना चाहिए, उल्टे तरीके से मिलाने पर कॉपर का अवक्षेपण होता है तथा परिणामस्वरूप सस्पेंशन का जहरीलापन कम हो जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0320 गुण ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0322 -प्राकृतिक चिपचिपापन या प्रवृत्ति ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0324 -तुलनात्मक रूप से सस्ता ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0326 -विस्तृत प्रकार के रोगों को नियंत्रित करने में सक्षम ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0328 -उपयोग में सुरक्षित ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0330 दोष ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0332 -सेब तथा आड़ू जैसे फ़सलों के लिए विषैला ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0334 -पकने में देरी ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0336 -धातु के बर्तन पर संक्षारण क्रिया करता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0340 -खट्टे फलों की विकृति पर नियंत्रण: गलन रोग नर्सरी, पौध, पत्ते, डालियों तथा फलों को प्रभावित करता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0341 लक्षण के दिखाई पड़ने के तुरंत बाद 1% बोरडॉक्स मिश्रण से प्रभावित नर्सरी-पौधों पर छिड़काव करनी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0343 -पुराने फलोद्यानों में मानसून से पहले प्रभावित डालों की छंटाई तथा 15 दिनों के अंतराल पर 3 से 5 बार 1% बोरडॉक्स मिश्रण का छिड़काव करनी चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0345 खट्टे फलों तथा पत्तियों पर विकृति ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0347 बोरडॉक्स पेस्ट ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0349 बोरडॉक्स पेस्ट बोरडॉक्स मिश्रण के अवयवों से ही बना होता है परंतु यह पेस्ट के रूप में होता है क्योंकि इसमें जल की कम मात्रा प्रयोग की जाती है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0350 इसका निर्माण 10 लीटर जल में 1 किलोग्राम चूना तथा 1 किलोग्राम कॉपर सल्फेट को मिला कर किया गया है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0351 घोल को मिश्रित करने की विधि बोरडॉक्स मिश्रण के समान ही हैं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0355 रोग ग्रसित टहनियों तथा डालियों के साथ कुछ छोटे स्वस्थ हिस्से की छंटाई करें तथा इसे जलाएं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0356 कटे हुए सिरे पर बोरडॉक्स पेस्ट का प्रयोग करना चाहिए। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0357 इसे वृक्ष के तल से 1 मीटर तक लेपित भी किया जा सकता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0359 बोरडॉक्स पेस्ट का प्रयोग प्राय: फरवरी-मार्च, सितंबर-अक्टूबर तथा दिसंबर-जनवरी के दौरान स्वस्थ पौधों को मिट्टी से उत्पन्न रोगाणु से बचाने के लिए किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0361 छटाईं के बाद कटे हुए सिरे पर इसे मरहम-पट्टी करने तथा चोटिल हिस्से की रक्षा के लिए प्रयोग किया जाता है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0363 बोरडॉक्स मिश्रण का वृक्ष के तल से 1 मीटर ऊंचाई तक प्रयोग ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0367 डॉ. पी राजा आर. श्रवनन, ई-एरिक (ई-एग्रीकल्चर) सहायक प्रोफेसर (पैथोलॉजी) आईसीटी फॉर एक्स्टेंशन कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री विलेज नॉलेज सेंटरसेंट्रल एग्रिकल्चर यूनिवर्सिटी याग्रुंग विलेजपासीघाट – 791102 पासीघाट,ईस्ट सिआंग डिस्ट्रिक्ट फोन नंबर: (मो) 09436250901 फोन नंबर : 2282323 ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0369 इंफाल में तोरिया सरसों की उपज में वृद्धि ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0371 शून्य जुताई द्वारा इंफाल में तोरिया सरसों की उपज में वृद्धि ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0373 पूर्व स्थिति एवं नई शुरुआत ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0375 वर्ष 2011 की रबी फसल के दौरान जनजातीय उप योजना के अंतर्गत सरसों अनुसंधान निदेशालय (डीआरएमआर), भरतपुर के सहयोग से शिक्षा विस्तार निदेशालय, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (सीएयू), इंफाल ने “उत्तर-पूर्वी राज्यों के आदिवासी किसानों की स्थायी आजीविका सुरक्षा के लिए सरसों उत्पादन में वृद्धि” नामक परियोजना को लागू किया। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0376 रबी की फसल में सिंचाई सुविधाओं की कमी और वर्षा की अनिश्चितता के कारण मणिपुर के किसान रबी की फसल नहीं लेते थे जिसके कारण न वंबर से जून के बीच चावल की फसल के बाद खेत खाली रह जाते थे। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0377 इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तोरिया सरसों की किस्मों एम-27, टीएस-36 और रागिनी तथा सरसों की किस्मों पूसा अग्रणी, पूसा महक, एनआरसीएचबी-101 और एनपीजे-112 को 55 हैक्टर क्षेत्र में शून्य जुताई तकनीक से बोया गया एवं पारंपरिक जुताई से 40 हैक्टर में की गई फसल से इसकी तुलना की गई। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0379 शून्य जुताई तकनीक ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0381 यद्यपि फसल के दौरान वर्षा नहीं हुई परन्तु चावल की फसल के बाद मिट्टी में मौजूद नमीं के कारण इन किस्मों से पारंपरिक जुताई तकनीक की अपेक्षा शून्य जुताई तकनीक से अच्छी पैदावार प्राप्त हुई। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0382 किस्मों के चयन परीक्षण के अंतर्गत पीली सरसों और रागिनी की उपज 10 क्विंटल प्रति हैक्टर के औसत के साथ सर्वाधिक रही जबकि एनआरसीएचबी-101 द्वारा सरसों की किस्मों में 10.2 क्विंटल प्रति हैक्टर के औसत के साथ सर्वाधिक उपज दी। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0383 जैविक शहद तैयार करने के लिए तोरिया सरसों के खिलने पर प्रति हैक्टर चार मधुमक्खियों की कॉलोनी भी बनाई गईं। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0387 इस परियोजना में पूर्वी इंफाल जिले के नौ गांवों के 172 किसान शामिल थे। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0388 परियोजना द्वारा साढ़े तीन माह के कम समय में किसानों ने केवल 7800 रुपये प्रति हैक्टर की कम लागत पर शहद की कीमत सहित लगभग 27000 रुपये प्रति हैक्टर का शुद्ध लाभ अर्जित किया। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0389 सभी किसानों ने खेतों पर आठ तथा संस्थान में दो प्रशिक्षण सत्रों में भाग लिया। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0390 साथ ही, 60 किसानों को जागरूक करने के लिए डीआरएमआर, भरतपुर की यात्रा भी करवाई गई। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0392 वर्तमान स्थिति ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0394 उच्च उत्पादकता वाली सरसों की किस्मों जैसे एनआरसीएचबी-101, पूसा अग्रणी आदि की वैज्ञानिक विधि से खेती को लोकप्रिय बनाने के लिए सीएयू ने तीन गावों में लघु सिंचाई प्रणालियों युक्त तीन जल संचयन संरचनाओं का निर्माण किया है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0395 वर्ष 2012 के रबी फसल काल में शून्य जुताई की इस अभिनव तकनीक से साथ के जिलों के किसान भी प्रभावित हुए हैं और तीन जिलों में लगभग 1000 हैक्टर में इस तकनीक से खेती की जा रही है। ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0397 स्त्रोत ebs_Uttar-Purav-Tech-Link-1-translation-hin2tel_0399 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद,सीएयू, इंफाल और डीआरएमआर, भरतपुर।