ID SENT ebs_agartala_0002 अगरतला ebs_agartala_0004 टैगलाइन – भूमि पहाड़ियों की और झीलों की ebs_agartala_0006 कब जाएँ - अक्टूबर और अप्रैल ebs_agartala_0008 पाठ्य अंश - अगरतला त्रिपुरा की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता की एक लघुझाँकी, और इस राज्य के अद्भुत पर्वतों का स्वागत द्वार है। ebs_agartala_0010 मुख्य विवरण - ebs_agartala_0012 त्रिपुरा की राजधानी अर्थात अगरतला नामक यह शहर हौरा (हावड़ा) नदी के किनारे पर स्थित है, और शाही विरासत के साथ-साथ समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और प्राकृतिक भव्यताओं का बेहतरीन मिश्रण प्रस्तुत करता है। ebs_agartala_0013 कभी शक्तिशाली शासकों का शक्ति केंद्र रहा अगरतला उज्जयंत राजमहल, सुरम्य झीलों और कई खूबसूरत मंदिरों जैसे शानदार आकर्षणों के लिए जाना जाता है । ebs_agartala_0014 यह गुवाहाटी के बाद पूर्वोत्तर भारत में स्थित दूसरा सबसे बड़ा शहर है, और अनछुए जंगलों, खूबसूरत घाटियों और गर्जना करते झरनों से घिरा हुआ है। ebs_agartala_0015 अपनी समृद्ध वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, जीवंत हथकरघा बाजार और अपने निवासियों के सहृदय आतिथ्य के कारण कुल मिलाकर अगरतला पर्यटकों के लिए एक आदर्श अवकाश गंतव्य है। ebs_agartala_0016 यह शहर उन लोगों के लिए मनोरंजन और रोमांच के खज़ाने जैसा भी है, जो इसके प्राकृतिक सौन्दर्य के रहस्यों की तलाश में हैं। ebs_agartala_0018 'अगरतला नाम दो शब्दों ''अग्र'' और ''ताल'' से मिलकर बना है।' ebs_agartala_0019 ''अगर'' एक विशेष प्रकार के ऑगरू वृक्ष से बनने वाले मूल्यवान तैलीय इत्र का नाम है, और प्रत्यय ''ताल'' का अर्थ है भण्डारगृह। ebs_agartala_0020 बांग्लादेश की सीमा के करीब स्थित यह शहर अखौरा सीमा पर आयोजित होने वाली तथा देशभक्ति से ओतप्रोत ध्वजारोहण की रस्म के लिए भी जाना जाता है। ebs_agartala_0024 उज्जयन्त महल (विरासत) ebs_agartala_0026 उज्जयन्त महल अगरतला शहर के केंद्र में स्थित एक प्रसिद्ध शाही घर है जिसका नाम नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने रखा था, जो त्रिपुरा के नियमित आगंतुक थे। ebs_agartala_0027 इसमें सुंदर टाइलों वाले फर्श, प्यारे दरवाजे और घुमावदार लकड़ी की छतें हैं, जो आपको उस समय के वास्तुकारों के अद्भुत कौशल से परिचित करवाती हैं। ebs_agartala_0028 महल में सार्वजनिक हॉल, एक सिंहासन कक्ष, एक दरबार हॉल, पुस्तकालय, एक स्वागत कक्ष और चीनी कक्ष है। ebs_agartala_0029 उज्जयन्त महल अब एक राज्य संग्रहालय है, जो उत्तर पूर्व भारत में रहने वाले समुदायों की जीवन शैली, कलाओं, सांस्कृतिक कलाकृतियों और उपयोगी शिल्पकार्य के प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध है। ebs_agartala_0030 इस तीन मंजिला हवेली में मिश्रित वास्तुकला का प्रभाव है और यह चारों ओर से मुगल उद्यान से घिरी हुई है। ebs_agartala_0031 यह महल एक अनूठा अनुभव प्रदान करता है और आगंतुकों को शांत बागों के बीच शाही इतिहास से रूबरू करवाता है। ebs_agartala_0033 महल का निर्माण त्रिपुरा के राजा, माणिक्य वंश के महाराजा राधा किशोर माणिक्य ने 1899 और 1901 के बीच करवाया था। ebs_agartala_0034 इसे 1972-73 में त्रिपुरा सरकार द्वारा शाही परिवार से खरीदा गया था। ebs_agartala_0036 नीरमहल (विरासत) ebs_agartala_0038 ‘नीरमहल’ नाम का शाब्दिक अर्थ जल महल है। ebs_agartala_0039 यह राजधानी अगरतला से 55 किमी दूर रुद्रसागर झील के बीच में स्थित एक शाही हवेली है। ebs_agartala_0040 1930 में महाराजा बीर बिक्रम किशोर देबबर्मन द्वारा उनके ग्रीष्मकालीन महल के रूप में निर्मित इस शाही भवन की वास्तुकला और बनावट में हिंदू और मुस्लिम शैलियों का बेहतरीन समावेश है। ebs_agartala_0041 यह महल संगमरमर और बलुआ पत्थर से बनाया गया है और देश में अपनी तरह के सबसे बड़े महलों में से एक है। ebs_agartala_0042 इसके सुंदर और सुव्यवस्थित बगीचे और फ्लड लाइटें महल के आकर्षण को बढ़ाते हैं। ebs_agartala_0043 महल के अन्य मुख्य आकर्षणों में जल क्रीड़ा अर्थात वाटर स्पोर्ट्स की सुविधाएं और विदेशों से आने वाले प्रवासी पक्षी शामिल हैं जिन्हें रुद्रसागर झील में देखा जा सकता है। ebs_agartala_0044 अगस्त में हर साल आयोजित होने वाले जल उत्सव के दौरान इस महल का आकर्षण विशेष रूप से बढ़ जाता है। ebs_agartala_0045 इस उत्सव के दौरान एक नाव दौड़ आयोजित की जाती है जो आगंतुकों को बड़ी संख्या में अपनी ओर खींचती है। ebs_agartala_0046 इसके अलावा, अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों और नाटक मंचन के साथ-साथ एक तैराकी प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। ebs_agartala_0048 बेनुबन विहार (आध्यात्मिक) ebs_agartala_0050 बेनुबन विहार त्रिपुरा के सबसे प्रमुख बौद्ध आकर्षणों में से एक है। ebs_agartala_0051 यह भगवान बुद्ध और बोधिसत्व की उन धातु की मूर्तियों के लिए जाना जाता है, जो बहुत पहले बर्मा में बनाई गई थीं। ebs_agartala_0052 इस मंदिर की उत्पत्ति का इतिहास अज्ञात है। ebs_agartala_0053 विहार का मुख्य आकर्षण बुद्ध पूर्णिमा का त्यौहार है जिसे प्रचंड ऊर्जा और शक्ति के साथ मनाया जाता है। ebs_agartala_0054 इसके अलावा, यह जगह पेड़ों के एक घने झुरमुट से घिरी हुई है जो आगंतुकों को शांति की भावना प्रदान करता है, जिससे मंदिर और अधिक प्रभावशाली प्रतीत होता है। ebs_agartala_0055 मंदिर की संरचना में एक विशिष्ट त्रिपुरी शैली की वास्तुकला का प्रभाव है और इसका लाल रंग का गर्भगृह भगवान बुद्ध को समर्पित है। ebs_agartala_0056 बेनुबन विहार कुंजाबन क्षेत्र में स्थित है। ebs_agartala_0058 सिपाहीजला वन्यजीव अभयारण्य (प्रकृति और वन्यजीव) ebs_agartala_0060 अगरतला से लगभग 25 किमी दूर स्थित, सिपाहीजला वन्यजीव अभयारण्य 19 किमी के क्षेत्र में फैला है और इसमें 150 से अधिक प्रजातियों के स्थानीय और प्रवासी पक्षी रहते हैं। ebs_agartala_0061 इस स्थान को वन्यजीव अभयारण्य और शैक्षणिक तथा अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। ebs_agartala_0062 वर्षों से, इस जगह ने अपने प्राकृतिक, वनस्पति और प्राणि उद्यानों के माध्यम से पर्यटकों और वन्यजीव प्रेमी लोगों की नज़रों में एक अलग ही जगह बना ली है। ebs_agartala_0063 वनस्पतियों से घिरा हरा-भरा यह इलाका और इसका समशीतोष्ण मौसम इसे विभिन्न प्रकार के जानवरों के लिए एक अनूठे आश्रय का रूप प्रदान करता है जिनमें कई प्रजातियों के बंदर, लंगूर और मकाक शामिल हैं। ebs_agartala_0064 इस सुन्दर पर्यटन स्थल में कई झीलें हैं, जिनमें से अमृत सागर झील सबसे लोकप्रिय है ebs_agartala_0065 जहाँ आगंतुकों को नौका विहार की सुविधा भी प्राप्त है। ebs_agartala_0066 यह अभयारण्य 1972 में स्थापित किया गया था और इसे पांच वर्गों में विभाजित किया गया है: मांसाहारी पशु अनुभाग, मानव-सदृश पशु अनुभाग, सरीसृप अनुभाग, खुरदार अनुभाग और पक्षी अनुभाग। ebs_agartala_0068 तृष्णा वन्यजीव अभयारण्य (वन्यजीव) ebs_agartala_0070 तृष्णा वन्यजीव अभयारण्य एक विविध स्थलाकृतियों से घिरी हुई वनस्थली है जो अनेकों बारहमासी झरनों, जल निकायों, घास के विस्तृत मैदानों, अनछुए जंगलों और दुर्लभ वनस्पतियों से आच्छादित व समृद्ध है। ebs_agartala_0071 197 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैले इस वनक्षेत्र का मुख्य वन्यजीव आकर्षण भारतीय गौर अर्थात एक अत्यधिक शक्तिशाली जंगली भैंसा है। ebs_agartala_0072 इसके अलावा, पक्षियों, हिरण, होललॉक गिब्बन, गोल्डन लंगूर, कैप्ड लंगूर, तीतर और विभिन्न अन्य जानवरों और सरीसृपों की किस्में यहाँ पाई जाती हैं। ebs_agartala_0073 अभयारण्य भ्रमण के लिए जीप सफारी की सुविधा उपलब्ध है, भारत के सबसे अधिक संरक्षित वनक्षेत्रों में से एक माना जाता है, और लोगों को शैक्षिक और दर्शनीय स्थलों की यात्रा के लिए आकर्षित करता है। ebs_agartala_0074 यह विशिष्ट स्थान 1988 में स्थापित किया गया था, यह बेलोनिया के उप-विभागीय शहर से लगभग 18 किमी दूर स्थित है। ebs_agartala_0075 यह अभयारण्य एक राज्य राजमार्ग द्वारा अगरतला से जुड़ा हुआ है। ebs_agartala_0077 जगन्नाथ मंदिर (आध्यात्मिक) ebs_agartala_0079 जगन्नाथ मंदिर, अगरतला में उज्जयंत महल के बगल में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, यह वास्तुकला की हिंदू और अरबी शैलियों के सुंदर व अद्भुत संलयन का एक बेहतरीन नमूना है। ebs_agartala_0080 भगवान जगन्नाथ, उनके भाई भगवान बलभद्र और उनकी बहन देवी सुभद्रा को समर्पित यह मंदिर देश-विदेश से हजारों आगंतुकों को आकर्षित करता है। ebs_agartala_0081 कहा जाता है कि पुरी में स्थापित भगवान जगन्नाथ या नील महादेव की मूर्ति इस मंदिर द्वारा दान की गई है। ebs_agartala_0082 इस मंदिर की वास्तुकला भी उल्लेखनीय है। ebs_agartala_0083 इसकी संरचना को चमकीले नारंगी संरचित को शिखरों से सजाया गया है और इसके स्तंभ चौकोर और पिरामिडनुमा कोणीय आकृतियों से सुसज्जित किया गया है। ebs_agartala_0084 इसका एक अन्य आकर्षण भगवान कृष्ण के जीवन की सुंदर लीला का चित्रण तथा मंदिर में स्थापित की गई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं। ebs_agartala_0085 यह मंदिर अगरतला के बाहर से आने वाले भक्तों के लिए अपने परिसर में ही आवास की सुविधा प्रदान करता है। ebs_agartala_0087 19 वीं शताब्दी में माणिक्य वंश के महाराजा राधा किशोर माणिक्य द्वारा इस जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किया गया था। ebs_agartala_0089 पिलक (विरासत) ebs_agartala_0091 हरे-भरे धान के खेतों के मध्य, दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया उपखंड में स्थित पिलक एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। ebs_agartala_0092 यह अपने पुरातात्विक अवशेषों और कलाकृतियों के रूप में विख्यात मूर्तियों, नक्काशी के काम, पत्थर के स्तूपों व टेराकोटा की सजीली पट्टियों के लिए प्रसिद्ध है, जो पहाड़पुर और मैनमाटी से बरामद की गई ढलवाँ पट्टियों के सदृश हैं, यह सभी कलारूप 8 वीं और 9 वीं शताब्दी के इतिहास की याद दिलाते हैं। ebs_agartala_0093 छवियों के चित्रण तथा मूर्तियों के शिल्प में पालन की जाने वाली शैलियों में बंगाल के पलास और गुप्त, अराकान और म्यांमार की मूर्तिकला और स्थापत्य शैली की छटा दिखाई देती है। ebs_agartala_0094 पिलक त्रिपुरा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण घटक है और हिंदू और बौद्ध संस्कृतियों का सुंदर मिलन प्रदर्शित करता है। ebs_agartala_0095 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक टीम ने साठ के दशक के अंत में यहाँ एक खुदाई के दौरान ईंट से बने स्तूपों का पता लगाया था और तब से यह स्थल उनकी देखरेख में है। ebs_agartala_0097 उदयपुर (प्रकृति) ebs_agartala_0099 अगरतला से लगभग 50 किलोमीटर दूर त्रिपुरा के दक्षिणी क्षेत्र में बसे, उदयपुर नामक नगर को अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है। ebs_agartala_0100 राजस्थान के रेगिस्तानी राज्य में स्थित अपने हमनाम शहर की ही तरह, यह उदयपुर भी अनेक सुंदर झीलों से घिरा हुआ है, जिनमें महादेव दिग्घी, धानी सागर, अमर सागर आदि शामिल हैं। ebs_agartala_0101 उदयपुर का परिदृश्य गोमती नदी द्वारा आच्छादित है। ebs_agartala_0102 इसका सबसे लोकप्रिय आकर्षण त्रिपुर सुंदरी मंदिर है, जो माँ त्रिपुर सुंदरी अर्थात इस शहर की पीठासीन देवी को समर्पित है। ebs_agartala_0103 1501 में निर्मित यह मन्दिर उन 52 शक्तिपीठों में से एक है जहां देवी सती के अलग-अलग हिस्से गिरे थे। ebs_agartala_0104 मंदिर में प्रार्थना-अर्चना अर्पित करने के बाद मन्दिर से सटी कल्याण सागर नामक एक बड़ी झील की यात्रा कर सकते हैं। ebs_agartala_0105 देवी भुवनेश्वरी को समर्पित भुवनेश्वरी मंदिर और एक सार्वजनिक पुस्तकालय जिसे नज़रुल ग्रंथागार कहा जाता है, भी यहाँ के लोकप्रिय बिंदु हैं। ebs_agartala_0107 खरीदारी (यहाँ क्या करें) ebs_agartala_0109 नीरमहल जल महोत्सव (कार्यक्रम) ebs_agartala_0111 नीरमहल, जिसका शाब्दिक अर्थ है पानी का महल, रुद्रसागर झील के बीच में तैरता हुआ एक भवन है। ebs_agartala_0112 यह एक सुरम्य स्थल है जो अपनी सुंदरता से लोगों को अनायास ही आमंत्रित करता है। ebs_agartala_0113 इस महल को संगमरमर और बलुआ पत्थर से बनाया गया है और यह वास्तुकला की दृष्टि से हिंदू और मुस्लिम दोनों शैलियों के संगम को दर्शाता है। ebs_agartala_0114 यह देश में अपनी तरह के सबसे बड़े महलों में से एक है, और ऐसा कहा जाता है कि इसे बनाने में लगभग नौ साल लगे। ebs_agartala_0115 इस महल में हर साल अगस्त के महीने में तीन दिवसीय उत्सव का आयोजन किया जाता है। ebs_agartala_0116 जिसके दौरान एक नाव दौड़ आयोजित की जाती है जो आगंतुकों को बड़ी संख्या में आमंत्रित करती है। ebs_agartala_0117 इसके अलावा, इस त्योहार के अवसर पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रम और नाटक भी आयोजित किए जाते हैं और एक तैराकी प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। ebs_agartala_0119 यह महल त्रिपुरा के महाराजा बीर बिक्रम किशोर देबबर्मा माणिक्य (1908-1947) का ग्रीष्मकालीन निवास हुआ करता था। ebs_agartala_0120 यह अगरतला से लगभग 53 किमी दूर स्थित है। ebs_agartala_0122 हेरिटेज पार्क (विरासत) ebs_agartala_0124 12 एकड़ क्षेत्रफल में विस्तृत हेरिटेज पार्क त्रिपुरा की आदिवासी और गैर-आदिवासी संस्कृतियों का अद्भुत चित्रण करता है। ebs_agartala_0125 यह पार्क तीन भागों में विभाजित है; जिन में से मिनी-त्रिपुरा प्रवेश द्वार के निकट लगभग तीन एकड़ भूमि में स्थित है, दूसरा केंद्रीय क्षेत्र जिसमें एक प्राकृतिक वन शामिल है, और तीसरा औषधीय पौधों, जड़ी बूटियों और झाड़ियों वृक्षों से घिरी हुई एक सपाट पठारीय भूमि है। ebs_agartala_0126 लगभग एक किलोमीटर का पैदल रास्ता इसके चारों ओर से गुज़रता है, जहाँ से पर्यटक पूरे परिसर का जायज़ा ले सकते हैं। ebs_agartala_0127 इस पार्क का मुख्य आकर्षण उनाकोटि की मूर्तियों, उज्जयंत महल, नीरमहल, त्रिपुर सुंदरी मंदिर व पिलक की पत्थरों से निर्मित कृतियों इत्यादि के लघु संस्करण हैं। ebs_agartala_0128 यहाँ तमाम देशी पेड़ और विदेशी फूल अच्छी तरह से संरक्षित किए गए हैं और पार्क की सुंदरता में इजाफा करते हैं। ebs_agartala_0129 इस हेरिटेज पार्क का उद्घाटन 30 नवंबर, 2012 को राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा किया गया था। ebs_agartala_0131 कमलासागर काली मंदिर (आध्यात्मिक) ebs_agartala_0133 कमलासागर काली मंदिर जोकि कस्बा काली बाड़ी के नाम से भी जाना जाता है, एक पहाड़ी पर स्थित है, इस पहाड़ी पर कमलासागर नामक पानी का एक बड़ा कुंड है। ebs_agartala_0134 बलुआ पत्थर से बनी महिषासुरमर्दिनी (देवी काली) की यहाँ स्थापना की गई है। ebs_agartala_0135 इस मंदिर का एक और अनोखा पहलू देवी दशभुजा दुर्गा के चरणों में स्थापित शिवलिंग है। ebs_agartala_0136 देश के विभिन्न हिस्सों और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से हजारों तीर्थयात्री विभिन्न त्योहारों के दौरान इस पवित्र मंदिर में आते हैं। ebs_agartala_0137 कमला सागर झील, मंदिर के साथ-साथ इस जगह की सुंदरता को भी बढ़ाती है, जिससे यह विश्राम करने और परिवार के साथ कुछ सुंदर क्षण बिताने के लिए एकदम सही जगह है। ebs_agartala_0138 यह मंदिर 15 वीं शताब्दी में माणिक्य वंश के महाराजा धन्या माणिक्य द्वारा बनाया गया था और इसका निर्माण कार्य अंततः स्थानीय शासकों द्वारा 17 वीं शताब्दी में पूरा किया गया था। ebs_agartala_0139 यह अगरतला से लगभग 27 किमी दूर स्थित है। ebs_agartala_0141 बॉक्सनगर (विरासत) ebs_agartala_0143 बॉक्सनगर बांग्लादेश से सटी सीमा के किनारे सोनमुरा सब डिवीजन के उत्तर-पश्चिमी भाग में अगरतला शहर से लगभग 40 किमी दूर स्थित है। ebs_agartala_0144 इतिहास-प्रेमियों के लिए यह स्थान विशेष रूप से आकर्षक है क्योंकि उन्हें मोहित करने के लिए यहाँ बहुत कुछ है। ebs_agartala_0145 इस ऐतिहासिक स्थल पर वर्ष 2001-02, 2002-03 और 2003-04 के दौरान पुरातात्विक अन्वेषण हेतु खुदाई की गई थी। ebs_agartala_0146 जिस के फलस्वरूप एक विशाल ईंट निर्मित स्तूप, एक चैत्यगृह और एक मठ की खोज की गई थी। ebs_agartala_0147 यह खोज प्राचीन त्रिपुरा की कला, वास्तुकला और धार्मिक पहलुओं को प्रदर्शित करती है। ebs_agartala_0148 वृक्षों की कटाई से जब यहाँ से प्राकृतिक वन आच्छादन कम हुआ, तब कोरबा बाजार के पास मनासा (नाग देवी) के एक प्राचीन मंदिर के अवशेष भी प्राप्त हुए। ebs_agartala_0149 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इस स्थल की खराब स्थिति को लेकर चिंता जताई और इसके उचित संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। ebs_agartala_0150 जुलाई 1997 में वरिष्ट पुरातत्वविद् डॉ. जितेंद्र दास ने इस स्थल का दौरा किया और भगवान बुद्ध की एक मूर्ति की खोज के बाद पुष्टि की कि यह एक बुद्ध मंदिर था। ebs_agartala_0151 वर्तमान में यह स्थल कंटीले तारों की बाड़ से अच्छी तरह सुरक्षित किया जा चुका है और इसका संरक्षण कार्य प्रगति पर है। ebs_agartala_0153 त्रिपुर सुंदरी मंदिर (आध्यात्मिक) ebs_agartala_0155 त्रिपुर सुंदरी मंदिर अगरतला से 55 किमी की दूरी पर स्थित है। ebs_agartala_0156 इसका निर्माण महाराजा धन्य माणिक्य देव ने 1501 ईस्वी में किया था, और इसे भारत में हिंदू तीर्थयात्रियों के 51 शक्ति पीठस्थानों में से एक माना जाता है। ebs_agartala_0157 इस जगह का धार्मिक महत्व काफी विशिष्ट है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी सती का दाहिना पैर भगवान शिव के तांडव नृत्य के दौरान यहां गिरा था। ebs_agartala_0159 मंदिर की संरचना में एक शंक्वाकार गुंबद के साथ ही विशिष्ट बंगाली-झोपड़ी शैली में निर्मित एक वर्गाकार गर्भगृह स्थित है। ebs_agartala_0160 यह एक पहाड़ी पर शानदार तरीके से निर्मित भवन है, जिसके अंदर एक ही देवी की दो एकरूप प्रतिमाएँ विद्यमान हैं। ebs_agartala_0161 त्रिपुर सुंदरी के इस मंदिर में देवी काली की मूर्ति को सोरोशी के रूप में पूजा जाता है। ebs_agartala_0162 हर साल मंदिर के पास एक प्रसिद्ध दीवाली मेला आयोजित किया जाता है जिस में दो लाख से भी अधिक तीर्थयात्रियों का जनसमूह एकत्रित होता है। ebs_agartala_0164 भुवनेश्वरी मंदिर (आध्यात्मिक) ebs_agartala_0166 भुवनेश्वरी मंदिर अगरतला में स्थित एक लोकप्रिय आध्यात्मिक स्थल है जिसका उल्लेख रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘राजर्षि’, और उनके ही नाटक ‘बिसर्जन’ में किया गया है। ebs_agartala_0167 गोमती नदी के तट पर अगरतला से लगभग 55 किमी दूर स्थित यह मंदिर देवी भुवनेश्वरी को समर्पित है। ebs_agartala_0168 लगभग 3 फुट ऊंचे समतल भूमिमंच पर स्थित इस मंदिर की संरचना में चार चाला छत, प्रवेश द्वार पर स्थित स्तूप और एक प्रमुख कक्ष शामिल हैं। ebs_agartala_0169 इसकी वास्तुकला का मुख्य आकर्षण फूलों की आकृतियों से सुसज्जित रूपांकन हैं जो इसके स्तंभों और स्तूपों को सुशोभित करते हैं। ebs_agartala_0170 आज यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की देखरेख में है। ebs_agartala_0171 इस मंदिर तक पहुँचने के रास्ते में माणिक्य वंश के महाराजा गोविंदा माणिक्य के महल के खंडहरीय अवशेष प्राप्त होते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने इसे 17 वीं शताब्दी में बनाया था। ebs_agartala_0173 डमबूर झील (भ्रमण) ebs_agartala_0175 डमबूर झील अगरतला की राजधानी शहर से लगभग 120 किलोमीटर दूर अमरपुर उप प्रभाग में स्थित है। ebs_agartala_0176 इसका आकार एक पतले डमरू की तरह है और इसीलिए भगवान शिव के डमरू के नाम पर इसका नाम डमबूर झील रखा गया है। ebs_agartala_0177 यह जगह प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है क्योंकि लगभग 41 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैली हुई यह झील चारों ओर से खूबसूरत पहाड़ियों और हरे-भरे परिदृश्य से आच्छादित 48 छोटे द्वीपों से घिरी हुई है। ebs_agartala_0178 यह राइमा और सरमा नदियों के संगम पर स्थित है और प्रवासी पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों के लिए घर की तरह है, जो यहाँ ज्यादातर सर्दियों के दौरान दिखाई देते हैं। ebs_agartala_0179 झील के पास एक जल विद्युत परियोजना स्थित है, जहाँ से गोमती नदी का उद्गम होता है। ebs_agartala_0180 इस स्थान को तीर्थमुख कहा जाता है और यह 14 जनवरी को प्रतिवर्ष यहां आयोजित होने वाले पौष संक्रांति मेले के लिए प्रसिद्ध है। ebs_agartala_0182 उनाकोटि ( भ्रमण) ebs_agartala_0184 अगरतला से लगभग 178 किमी दूर स्थित उनाकोटि एक सदियों पुराना शैव तीर्थ स्थान है, जो कि देश की किसी भी अन्य तीर्थस्थली की तुलना में अपनी भव्यता और कलात्मकता के कारण विलक्षण है। ebs_agartala_0185 इस स्थान पर हिंदू देवी-देवताओं की बहुत सी अद्भुत मूर्तियां स्थित हैं, जिनमें शास्त्रीय भारतीय शैली की देशज आदिवासी परंपराएँ दृष्टिगोचर होती हैं। ebs_agartala_0186 उनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण भगवान शिव के सिर की 33 फुट ऊंची मूर्ति है, जिनके इस रूप को उनाकोटीश्वर काल भैरव के नाम से जाना जाता है। ebs_agartala_0187 इसे और अधिक आकर्षक बनाता है 10 फ़ीट ऊँचा एक साफ़ा जिसके एक तरफ़ युद्धरत माँ दुर्गा और दूसरी तरफ मकरासन पर विराजमान देवी गंगा स्थित हैं। ebs_agartala_0188 पुरातत्वविदों के अनुसार यद्यपि यहाँ शिव पंथ का प्रमुख प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, फिर भी यहाँ स्थापित दैवीय मूर्तियां यहाँ की आध्यात्मिक मान्यताओं पर तांत्रिक, शाक्त और हठ योगियों के प्रभाव की गवाही देती हैं। ebs_agartala_0189 यह माना जाता है कि इस स्थल का जीवंत काल 12 वीं और 16 वीं शताब्दी के बीच की अवधि में रहा होगा, और यहाँ स्थापित मूर्तियां दो विभिन्न कलात्मक कालखंडों से सम्बद्ध हैं। ebs_agartala_0191 अखौरा सीमा (विरासत) ebs_agartala_0193 अगरतला - अखौरा चौकी बांग्लादेश के साथ भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र है, जिसका उद्घाटन 2013 में किया गया था। ebs_agartala_0194 यह चौकी भारत और बांग्लादेश के मध्य विभाजन रेखा का कम करती है और देश के सीमावर्ती राज्य त्रिपुरा में स्थित है। ebs_agartala_0195 अगरतला शहर से लगभग 6 किमी दूर स्थित यह अंतर्राष्ट्रीय सीमा अमृतसर की प्रसिद्ध वाघा सीमा के ही समान है। ebs_agartala_0196 यह स्थान एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जहाँ आगंतुक एक विशेष रस्म के अवलोकन के लिए आते हैं जिसके अंतर्गत भारत व बांग्लादेश दोनों देशों के झंडों को उनके सुरक्षा कर्मियों द्वारा परस्पर समन्वित प्रदर्शन के साथ उतारा जाता है। ebs_agartala_0197 सीमा के दोनों ओर माल और यात्रियों के सहज आवागमन के उद्देश्य से बनाई गई यह सीमा भारत-बांग्लादेश संबंधों को बढ़ावा देने में भी मदद करती है। ebs_agartala_0198 अन्य नज़दीकी पर्यटन आकर्षणों में उज्जयंत महल, नीर महल आदि शामिल हैं। ebs_agartala_0200 जम्पुई हिल (भ्रमण) ebs_agartala_0202 जम्पुई हिल त्रिपुरा में स्थित एक लोकप्रिय पर्वतीय स्थल है, जो समुद्र तल से 3,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। ebs_agartala_0203 अनन्त वसंत की भूमि के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान चटगाँव की पहाड़ियों, कंचनपुर-दसदा घाटी और त्रिपुरा और मिज़ोरम की विविध पहाड़ी श्रृंखलाओं के मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। ebs_agartala_0204 यहाँ स्थित संतरे के खेतों, चाय के बागानों और हरे-भरे मैदानों को देखते हुए पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। ebs_agartala_0205 बड़ी संख्या में घरेलू और विदेशी पर्यटक यहाँ इसलिए भी आते हैं क्योंकि यह सबसे अच्छे शिविर स्थलों में से एक है और पर्वतारोहण के लिए भी आदर्श स्थान है। ebs_agartala_0206 यहाँ की पहाड़ियों की ढलानों पर संतरे के अनेकों विस्तृत खेत स्थित हैं, जहां से गुज़रते समय आगंतुक हवा में फैली हुई इन फलों की मीठी गंध को महसूस कर सकते हैं। ebs_agartala_0207 जम्पुई हिल की यात्रा के लिए सर्दियों का मौसम सबसे अच्छा है क्योंकि हर साल नवंबर में यहां संतरा एवं पर्यटन उत्सव आयोजित किया जाता है। ebs_agartala_0208 इस उत्सव के दौरान, संतरों से बनी विभिन्न वन्यजीवों और देश के प्रख्यात किलों की आकृतियों को प्रदर्शित किया जाता है। ebs_agartala_0209 इसके अतिरिक्त तिब्बती हस्तशिल्प, चाय की पत्तियाँ, संतरे और कॉफी बीन्स इस उत्सव के दौरान स्टालों में बेची जाने वाली कुछ प्रमुख वस्तुएं हैं। ebs_agartala_0210 जम्पुई हिल अगरतला से लगभग 200 किमी दूर स्थित है। ebs_agartala_0212 सूचीबद्ध लेख ebs_agartala_0216 इस शहर की संस्कृति में और अधिक गहरे रचने-बसने वाले अनुभव को प्राप्त करने के लिए, यहां कई गतिविधियाँ को अंजाम दिया जा सकता है ebs_agartala_0220 अगरतला की हलचल भरी गलियां एक आदर्श ख़रीदार के लिए सपनों की मंजिल जैसी हैं, खासकर यदि आप हस्तशिल्प द्वारा निर्मित लाजवाब आदिवासी उत्पादों को पसंद करते हैं। ebs_agartala_0221 इन में बेंत और बांस के फर्नीचर जैसे बांस के सोफे, सुरुचिपूर्ण ढंग से तैयार की गई लकड़ी की अलमारी, सेंटर टेबल, डाइनिंग टेबल, दीवान-कम-बेड, फोम के दीवान और डाइनिंग टेबल शामिल हैं। ebs_agartala_0222 यहाँ के प्रसिद्ध मूढ़ों अर्थात छोटे स्टूलों को खरीदना हरगिज़ न भूलें। ebs_agartala_0223 त्रिपुरा की जनजातियों द्वारा बुने तथा डिज़ाइन किए गए कपड़े विविध रंगों और आकर्षक स्वरूपों में उपलब्ध होते हैं। ebs_agartala_0224 अपने साथ यहाँ की स्मृतियों को संजो कर घर ले जाने के लिए यह आदर्श वस्तुएँ हैं। ebs_agartala_0225 हथकरघा त्रिपुरा का प्रमुख शिल्प है और यहाँ के निवासियों की कारीगरी की सहज कला तथा विशिष्टता को भलीभांति दर्शाता है। ebs_agartala_0226 जटिल विन्यास और आकृतियों के आधार पर डिज़ाइन किए गए हस्तनिर्मित कपड़े, और रेशम व बेंत और बांस की आकर्षक वस्तुएँ यहाँ के कला और शिल्प आधारित उद्योगों का मुख्य रूप हैं। ebs_agartala_0227 इसके अतिरिक्त फर्नीचर, खिलौने, साड़ियाँ, दैनिक उपयोग की वस्तुएं जैसे लैंप शेड्स, टोकरियाँ, पंचांग, हाथी दांत से बनी कलाकृतियाँ और त्रिपुराई आदिवासियों के सुंदर आभूषण, यहाँ खरीदारी करने को एक आनंदमय अनुभव बनाते हैं। ebs_agartala_0229 त्रिपुरा राजकीय संग्रहालय ebs_agartala_0231 1970 में निर्मित त्रिपुरा राजकीय संग्रहालय पर्यटकों के आकर्षण का बेहतरीन केन्द्र है जो विभिन्न देशों के आगंतुकों के लिए भली प्रकार सुसज्जित है। ebs_agartala_0232 यह संग्रहालय उज्जयंत महल में स्थित है और इसके गलियारों में 76 वीथियाँ स्थित हैं। ebs_agartala_0233 आगंतुकों हेतु प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत वस्तुओं की कुल संख्या लगभग 1,406 है; और इनमें सोने, चांदी और कांस्य के सिक्के, कांस्य की मूर्तियाँ, भित्ति चित्र, टेराकोटा की पट्टिकाएँ, पत्थर के शिलालेख, ताम्रपत्र, वस्त्र और आभूषण शामिल हैं। ebs_agartala_0234 इस संग्रहालय का मुख्य उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर भाग की प्रकृति व मनुष्य के इतिहास का संरक्षण व प्रस्तुतिकरण है। ebs_agartala_0236 राज्य जनजातीय संस्कृति अकादमी ebs_agartala_0238 राज्य जनजातीय संस्कृति अकादमी त्रिपुरा की जातीय संरचना में एक व्यापक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। ebs_agartala_0239 इस राज्य की सदियों पुरानी जनजातीय संस्कृतियों को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण के लिए 2009-2010 के कालखंड में इसे स्थापित किया गया था। ebs_agartala_0240 इस अकादमी में आदिवासी वेशभूषा, हस्तशिल्प, उपकरण, बर्तन और दैनिक जीवन की वस्तुओं का सुंदर प्रदर्शन किया जाता है, जो राज्य के 19 आदिवासी संस्कृतियों से लिए गए हैं। ebs_agartala_0241 इनमें से अधिकांश भारतीय-मंगोल परिवारों के बोडो समूह से सम्बद्ध हैं। ebs_agartala_0242 यदि आप त्रिपुरा के इतिहास में झांकने के इच्छुक हैं, तो यह अकादमी आपको वास्तव में एक रोमांचक अनुभव प्रदान कर सकती है। ebs_agartala_0244 सुकांता अकादमी ebs_agartala_0246 सुकांता अकादमी एक विज्ञान केंद्र है जिसे त्रिपुरा सरकार द्वारा बच्चों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से विज्ञान, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु स्थापित किया गया है। ebs_agartala_0247 विज्ञान के छात्रों, अनुसंधानरत विद्वानों और वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए इस परिसर के भीतर एक छोटा सा तारामंडल भी स्थापित किया गया है। ebs_agartala_0248 इस स्थान की आधारशिला वर्ष 1986 में रखी गई थी। ebs_agartala_0252 कला व शिल्प ebs_agartala_0254 चूंकि त्रिपुरा में एक बड़ी आबादी जनजातीय है, इसलिए यहां कई तरह की पारंपरिक शिल्पकलाओं का अभ्यास किया जाता है। ebs_agartala_0255 हथकरघा यहाँ का मुख्य शिल्प है, और सुन्दरता से डिजाइन किए गए करघे तथा बेंत और बांस की कृतियाँ यहाँ के उद्योग की प्रमुख विशेषताएँ हैं। ebs_agartala_0256 यदि आप अगरतला में हैं तो इन अद्वितीय कला और शिल्प उत्पादों की खरीदारी ज़रूर करें। ebs_agartala_0258 स्थानीय फर्नीचर ebs_agartala_0260 अगरतला में बांस, बेंत और लकड़ी की बहुतायत होती है, जिनका उपयोग अनेक प्रकार के फर्नीचर बनाने के लिए किया जाता है। ebs_agartala_0261 विभिन्न प्रकार के बांस सोफे, सुन्दरतापूर्वक तैयार की गई लकड़ी की अलमारियाँ, सेंटर टेबल, डाइनिंग टेबल, दीवान-कम-बेड, फोम के दीवान और डाइनिंग टेबल इत्यादि बड़े पैमाने पर अगरतला में बनाए और निर्यात किए जाते हैं। ebs_agartala_0262 इनमें सबसे प्रसिद्ध त्रिपुरा मूढ़ा है, जो बांस और बेंत के छिले हुए तंतुओं से बना एक छोटा सा स्टूल होता है। ebs_agartala_0263 बाँस का उपयोग इसका बुनियादी ढाँचा खड़ा करने में किया जाता है, जबकि बेंत के छिले हुए तंतुओं से सभी तत्वों को बाँधा जाता है और सीट की बुनाई की जाती है। ebs_agartala_0264 मूढ़े की मज़बूती व टिकाऊपन इसके बंधन की शक्ति में निहित है। ebs_agartala_0266 बरसाती टोपियाँ व सिर के आकर्षक पहनावे ebs_agartala_0268 त्रिपुरा कुशल कारीगरों और कारीगरों की भूमि है, जो बहुत होशियारी से बारिश से ‘पथला’ नामक एक विशिष्ट गोलाकार बरसाती टोपी बनाते हैं। ebs_agartala_0269 इसके शीर्ष शंकु का आधार 230 मिमी व ऊँचाई 110 मिमी होती है। ebs_agartala_0270 वृत्ताकार आकृति को थोड़ा नीचे की ओर झुकाया जाता है और अमूमन इसका व्यास लगभग 550 मिमी होता है। ebs_agartala_0271 यह पांच तत्वों से बने पंचकोण जैसा दिखता है, जिनमें से प्रत्येक में बांस की तीन पट्टियाँ होती हैं, जो शंकु के शीर्ष को घेरे रहती हैं। ebs_agartala_0272 शंकु पर प्रत्येक तत्व को निरूपित षट्कोण भी तीन पट्टियों के साथ बनाए जाते हैं। ebs_agartala_0273 बांस की पांच परस्पर जुडी हुई पट्टियाँ शंकु के शीर्ष को मजबूत बनाती हैं। ebs_agartala_0274 इन पट्टियों को शंकु के साथ बुन कर मज़बूती से स्थापित कर दिया जाता है। ebs_agartala_0276 स्थानीय लोग सिर ढंकने के लिए आकर्षक पहनावा भी बनाते हैं, जो पीतल और रंगीन बेंत से बना होता है और इसे साही के काँटों, तोते के पंखों व लाल ऊन से सजाया जाता है। ebs_agartala_0277 इस आकर्षक पहनावे का उपयोग विशेष रूप से लोक नृत्य प्रदर्शन के दौरान किया जाता है। ebs_agartala_0279 टोकरी ebs_agartala_0281 त्रिपुरा की जनजातियों के लिए टोकरी निर्माण एक महत्वपूर्ण व्यवसाय है। ebs_agartala_0282 यहाँ जामेटिया फायरवुड टोकरी, रयांग टोकरी, करवला टोकरी, लाई, सेमपा खारी, खजूर की टोकरी, टुरी और अनाज भंडारण टोकरी जैसी विभिन्न प्रकार की टोकरियाँ आसानी से मिल जाएंगी। ebs_agartala_0283 परंपरागत रूप से बाँस का उपयोग टोकरी बनाने के लिए किया जाता है, जैसे खुली बुनाई वाली टोकरियाँ, बंद-बुनाई की ढोने वाली टोकरियाँ इत्यादि। ebs_agartala_0285 हथकरघा ebs_agartala_0287 त्रिपुरा राज्य में हथकरघा सबसे बड़ा और शायद सबसे पुराना उद्योग है। ebs_agartala_0288 त्रिपुरा की जनजातियाँ अपने लिए कपड़े स्वयं ही बुनती और डिजाइन करती हैं, जो विभिन्न रंग संयोजनों व आकर्षक कलास्वरूपों में बनाए जाते हैं। ebs_agartala_0289 रिहा और रिसा यहाँ की दो प्रसिद्ध कपड़ा निर्माण सामग्रियाँ हैं और आप त्रिपुरा में हों तो इन दोनों की जाँच करना हरगिज़ न भूलें। ebs_agartala_0290 राज्य के प्रामाणिक हथकरघा निर्मित कपड़े विभिन्न एम्पोरियम और सड़क किनारे की दुकानों पर उपलब्ध हैं। ebs_agartala_0292 बेंत और बांस हस्तशिल्प ebs_agartala_0294 बेंत और बांस के हस्तशिल्प त्रिपुरा की अर्थव्यवस्था में काफी बड़ा योगदान करते हैं। ebs_agartala_0295 बेंत और बांस का उपयोग करके बनाई गई विभिन्न वस्तुओं जैसे कुर्सियां, टेबल, मैट, टोपी, बैग, हाथ के पंखे, कंटेनर आदि अत्यधिक टिकाऊ होते हैं और विभिन्न देशों में निर्यात किए जाते हैं, जहां उनकी बहुत मांग है। ebs_agartala_0296 बेंत और बांस का उपयोग आंतरिक सजावट उत्पादों जैसे कि पट्टिका, चौखटा, छत, बर्तन आदि बनाने के लिए भी किया जाता है। ebs_agartala_0298 मछली जाल और मछली पकड़ने की टोकरी ebs_agartala_0300 मछली जाल और मछली पकड़ने की टोकरी इस राज्य की जनजातियों के मध्य प्रचलित सम्मानित शिल्प हैं। ebs_agartala_0301 सुधा मूल रूप से आयत के आकार में बनाई गई बांस की जालनुमा चटाई होती है जिसे खुली बुनाई के माध्यम से बुना जाता है। ebs_agartala_0302 इसे पानी में लटका कर दोनों ओर से हाथों में पकड़ लिया जाता है ताकि जाल के सामने का झुकाव पानी के प्रवाह के खिलाफ हो। ebs_agartala_0303 जाल में फँसने वाली मछलियों को पानी से बाहर निकाल लिया जाता है और एक टोकरी में रखा जाता है। ebs_agartala_0304 ये टोकरियाँ विभिन्न आकृतियों और आकारों में आती हैं और शंक्वाकार या बेलनाकार हो सकती हैं। ebs_agartala_0306 हुक्के ebs_agartala_0308 यहाँ के हुक्के त्रिपुरा की रियांग जनजाति द्वारा बनाए जाते हैं और आम तौर पर तंबाकू जलाने या धूम्रपान के लिए उपयोग किए जाते हैं। ebs_agartala_0309 इस की बनावट कुछ इस प्रकार होती है, इसमें एक मिट्टी की चिलम पतली बांस की नली द्वारा दूसरे मोटे बा़ँस से जुड़ा होता है। ebs_agartala_0310 इस बाँस की चौड़ाई काफी होती है और यह लगभग दो पोर लंबी होती है। ebs_agartala_0311 इस बाँस के पोर के बीच से झिल्ली को निकाल दिया जाता है। लेकिन अंतिम झिल्ली को छोड़ दिया जाता है। जिससे कि उसमें पानी जमा हो सके। ebs_agartala_0312 पतली वाली बाँस की नली, मोटे बाँस में जहाँ तक पानी का स्तर है, उसके नीचे लगी होती है। ebs_agartala_0313 दूसरे छोर से मिट्टी का चिलम लगा होता है जिसमें तंबाकू जलाया जाता है। ebs_agartala_0317 भोजन व व्यंजन ebs_agartala_0319 मज़ा लेने लायक व्यंजन ebs_agartala_0321 अगरतला में एक जीवंत खोमचा भोजन संस्कृति व्याप्त है, जिसमें विभिन्न तले हुए व्यंजन, चाय आदि शामिल हैं। ebs_agartala_0322 इसके व्यंजनों पर विशिष्ट बंगाली प्रभाव मौजूद है और इसीलिए कई बंगाली शैली की मिठाइयाँ भी यहाँ देखी जा सकती हैं। ebs_agartala_0323 इसके अलावा, चीनी, कॉन्टिनेंटल, थाई, भारतीय और स्थानीय रेस्तरांओं में भी खाना खाया जा सकता है। ebs_agartala_0324 जो लोग यहाँ के स्थानीय स्वाद का लुत्फ़ उठाना चाहते हैं, यहां विशेष रूप से तैयार व्यंजन भी उपलब्ध हैं। ebs_agartala_0326 बेरमा ebs_agartala_0328 त्रिपुरा के भोजन का मुख्य घटक बेरमा है, जो किण्वित और सूखी मछली का ही दूसरा नाम है। ebs_agartala_0329 इसका स्वाद विशिष्ट रूप से तीखा होता है और इसका उपयोग इस राज्य के अधिकांश सब्ज़ी-आधारित व्यंजनों में किया जाता है। ebs_agartala_0330 बेरमा को ज्यादातर मसाले के रूप में यहाँ के अधिकांश व्यंजनों में शामिल किया जाता है क्योंकि इसमें थोड़ा नमकीन और मसालेदार स्वाद होता है। ebs_agartala_0332 चौक ebs_agartala_0334 चौक ताज़ा बनाई हुई चावल की शराब है, जो पानी में चावल को किण्वित करके तैयार की जाती है। ebs_agartala_0335 यह एक प्रसिद्ध पेय है जिसे विशेष अवसरों और त्यौहारों पर त्रिपुरा निवासियों द्वारा तैयार किया जाता है। ebs_agartala_0337 गुडोक ebs_agartala_0339 गुडोक त्रिपुरा का एक सहज और स्वदेशी भोजन है। ebs_agartala_0340 पारंपरिक गुडोक पाकविधि में मुख्य घटक के रूप में बेरमा का उपयोग किया जाता है, साथ ही इसमें ताजी सब्जियां जैसे कि सोबई / स्नेक बीन्स / चावली / चौडा, आलू, हरी मिर्च, बांस के तने, कटहल के बीज इत्यादि के साथ मिलाया जाता है। ebs_agartala_0341 गुडोक में एक विशिष्ट सुगंध और एक शानदार स्वाद होता है और इसे सादे चावल के साथ परोसा जाता है। ebs_agartala_0343 मुया बाई वहान ebs_agartala_0345 मुया बाई वहान को बांस के तने, कटहल, पपीते और सूअर के माँस के साथ बनाया जाता है। ebs_agartala_0346 गर्म चावल के साथ परोसे जाने पर इसका स्वाद सबसे अच्छा होता है। ebs_agartala_0348 मोसडेंग सेर्मा ebs_agartala_0350 मोसडेंग सेर्मा मुख्य रूप से एक चटपटी टमाटर की चटनी है जिसे बेरमा, लाल मिर्च और लहसुन के साथ तैयार किया जाता है। ebs_agartala_0351 यह मसालेदार व्यंजन है और इसे किसी भी तरह के भोजन के साथ खा लिया जाता है। ebs_agartala_0352 इसे ज्यादातर दोपहर और रात के खाने के लिए परोसा जाता है। ebs_agartala_0354 मुया अवान्द्रू ebs_agartala_0356 यह व्यंजन चावल के शौक़ीन लोगों को अद्भुत स्वाद देती है। ebs_agartala_0357 इसे बांस के तने, चावल के आटे और बेरमा से बनाया जाता है। ebs_agartala_0361 हवाई मार्ग से: अगरतला हवाई अड्डा शहर से 12 किमी दूर स्थित है और कोलकाता, गुवाहाटी, दिल्ली और चेन्नई के साथ हवाई मार्ग के माध्यम से सीधे जुड़ा हुआ है। ebs_agartala_0363 रेल द्वारा: अगरतला एक्सप्रेस ट्रेनों के माध्यम से गुवाहाटी, एनजेपी, सियालदह और आनंद विहार जैसे प्रमुख जंक्शनों से जुड़ा हुआ है। ebs_agartala_0364 राज्य का मुख्य रेलवे जंक्शन अगरतला के बदरघाट में स्थित है। ebs_agartala_0366 सड़क मार्ग से: अगरतला राष्ट्रीय राजमार्ग NH-44 से जुड़ा हुआ है, यहाँ से 24 घंटे में गुवाहाटी पहुंचा जा सकता है।