ID SENT ebs_alwar_0002 अलवर ebs_alwar_0004 टैगलाइन: राजस्थान की विरासत ebs_alwar_0006 यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च ebs_alwar_0008 उद्धरण: राजस्थान के जीवंत राज्य का प्रवेश द्वार अलवर नामक ऐतिहासिक शहर एक शाही विरासत के अवशेष समेटे हुए है ebs_alwar_0012 अलवर का दौरा करना ऐसा लगता है जैसे आप बीते हुए समय की ओर बढ़ रहे हैं। ebs_alwar_0013 अरावली पर्वतमाला में बसा यह शहर एक भव्य किले और महलों से लेकर शाही मैदान में बने एक वन्यजीव अभयारण्य तक, उस बीते हुए समय के असंख्य ऐतिहासिक रत्नों को समेटे हुए है, जब यह राजस्थान के सबसे पुराने और समृद्ध राज्यों में से एक हुआ करता था। ebs_alwar_0015 इस शहर का केंद्रबिंदु है यहाँ का विशालकाय बाला किला, जो किसी भव्य स्मारक से कम नहीं है। ebs_alwar_0016 छह शानदार द्वारों और सुंदर वास्तुकला से सुसज्जित यह किला शहर का विहंगम दृश्य देखने के लिए एक आदर्श स्थल है। ebs_alwar_0017 एक और आकर्षण सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य है, जो कि पूर्व महाराजा का शिकार आरक्षित क्षेत्र था। ebs_alwar_0018 बाघ, चीतल, नीलगाय, सांभर आदि पशुओं की एक बड़ी आबादी से भरा हुआ यह अभयारण्य खजुराहो जैसी नक्काशी से सजे किलों और मंदिरों के प्राचीन खंडहरों के लिए भी जाना जाता है। ebs_alwar_0020 महाकाव्य महाभारत में अलवर का उल्लेख मिलता है, जिसमें यह वर्णित है कि पांडव भाइयों ने अपने निर्वासन का एक हिस्सा यहाँ बिताया था। ebs_alwar_0021 अलवर 1500 ईसा पूर्व में विराटनगर के मत्स्य प्रदेशों का एक हिस्सा था। ebs_alwar_0022 इसके अलावा, मुगल काल के दौरान भी इस क्षेत्र का प्रमुख महत्व था क्योंकि यह पड़ोसी राज्यों पर हमले शुरू करने के लिए एक आधार के रूप में कार्य करता था। ebs_alwar_0023 बाद में इसे भरतपुर के जाट शासक ने जीत लिया। ebs_alwar_0024 हालांकि, माछरी के प्रताप सिंह ने 1775 में जाटों से इसे वापस ले लिया और इसे एक अलग राज्य के रूप में स्थापित किया। ebs_alwar_0028 बाला किला (विरासत) ebs_alwar_0030 अरावली रेंज में स्थित विशाल बाला किला किसी भव्य स्मारक से कम नहीं है। ebs_alwar_0031 15 वीं शताब्दी में, मेवात के राजपूत शासक हसन खान मेवाती द्वारा शहर के संरक्षक के रूप में निर्मित यह किला 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, इसकी संरचना मजबूत है और नाजुक जालीदार बालकनियों व संगमरमर के स्तंभ इसे पूरा आकार देते हैं। ebs_alwar_0032 किले के आकार की कल्पना इसके छह भव्य द्वारों: पोल, सूरज पोल, लक्ष्मण पोल, चांद पोल, कृष्ण पोल और अंधेरी गेट द्वारा की जा सकती है। ebs_alwar_0033 पर्यटक इस किले पर चढ़ते हैं और वहाँ से वे अलवर शहर के व्यापक नज़ारे देखते हैं। ebs_alwar_0035 बाला किला या युवा किला अपने सुनहरे दिनों के दौरान एक शक्ति केंद्र था और इस क्षेत्र पर शासन करने वाले यादवों, मराठों व कछवाहा राजपूतों जैसे राजवंशों के बीच हस्तगत किया जाता रहा। ebs_alwar_0036 वास्तव में अलवर शहर की नींव 1775 में कछवाहों द्वारा रखी गई थी जब उन्होंने इस किले पर कब्जा कर लिया था। ebs_alwar_0037 मुगलों के उदय से पहले राज्य में निर्मित कुछ किलों में से एक यह किला वास्तव में एक खजाने जैसा है। ebs_alwar_0038 कहा जाता है कि मुगल बादशाह बाबर और अकबर भी यहां रह चुके हैं। ebs_alwar_0040 वर्तमान में, बाला किले में एक रेडियो ट्रांसमीटर स्टेशन स्थापित है और सिटी पैलेस परिसर में पुलिस अधीक्षक की अनुमति पर भी किले के कुछ ही हिस्सों का दौरा किया जा सकता है। ebs_alwar_0042 सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य (प्रकृति और वन्यजीव) ebs_alwar_0044 कभी अलवर के महाराजा का शिकार आरक्षित क्षेत्र रही सरिस्का घाटी आज विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों और जीवों से आबाद है। ebs_alwar_0045 इस पार्क में बाघ, नीलगाय, सांभर, चीतल आदि पशु निवास करते हैं। ebs_alwar_0046 यहां तक ​​कि शाम के समय भारतीय साही, धारीदार लकड़बग्घे, तेंदुए भी यहाँ देखे जा सकते हैं। ebs_alwar_0047 इस स्थान पर भारतीय मोरों, चीलों, सुनहरी पीठ वाले कठफोड़वों, भारतीय सींग वाले उल्लुओं की एक बड़ी आबादी होने के कारण यह पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसी जगह है। ebs_alwar_0049 अभयारण्य के अधिकांश हिस्से में शुष्क पर्णपाती जंगल हैं, जो इसके उत्तर पूर्व में शांत सिलिसेर झील को आच्छादित रखते हैं। ebs_alwar_0050 अभयारण्य के चारों ओर प्राचीन मंदिरों के खंडहर फैले हुए हैं, जिनमें से अधिकतर 10 वीं और 11 वीं शताब्दी के हैं। ebs_alwar_0051 कांकेरी किला और 10 वीं शताब्दी के नीलकंठ मंदिरों के खंडहर इसके कुछ मुख्य आकर्षण हैं । ebs_alwar_0052 इन मंदिरों का रास्ता ऊबड़-खाबड़ है, लेकिन वास्तुकला और खजुराहो जैसी नक्काशी दर्शकों के मन पर अपनी छाप छोड़ देगी। ebs_alwar_0053 मंदिर अभ्यारण्य के अंदर 30 किमी की दूरी पर हैं, जहाँ मोर जैसे खूबसूरत पक्षी देखे जा सकते हैं। ebs_alwar_0054 इन मंदिरों से लगभग 100 मीटर दूर जैन तीर्थंकर शांतिनाथ की एक अखंड पत्थर से बनी मूर्ति भी है। ebs_alwar_0055 सरिस्का अभयारण्य में धार्मिक महत्व का एक और दिलचस्प स्थल पांडुपोल है, जिसके बारे में कहा जाता है कि पांडवों में सबसे शक्तिशाली भीम ने यहाँ विशालकाय दानव हिडिंब को हराया था और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया था। ebs_alwar_0056 यह भी माना जाता है कि पांडवों के वनवास के दौरान भीम ने यहां शरण ली थी। ebs_alwar_0057 इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लंगूर, मोर इत्यादि पाए जाते हैं। ebs_alwar_0059 1955 में एक वन्यजीव अभयारण्य के रूप में घोषित किए गए सरिस्का ने वर्ष 1979 में एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा प्राप्त किया। ebs_alwar_0060 इस स्थान में घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से जून तक है। ebs_alwar_0062 हिल फोर्ट केसरोली (विरासत) ebs_alwar_0064 14 वीं शताब्दी के एक जर्जर किले को अब एक हेरिटेज होटल में बदल दिया गया है। ebs_alwar_0065 यह किला एक बड़ी चट्टान पर स्थित है और एक शानदार नज़ारे का प्रदर्शन करता है। ebs_alwar_0066 मजबूत दीवारों से घिरा हुआ यह किला ज्यादातर ग्रेनाइट से बना है और कई दमदार खम्भों पर टिका हुआ है। ebs_alwar_0067 इस भवन में सब कुछ भव्य और विशाल है - हॉल, खिड़कियां, छत और बरामदे। ebs_alwar_0068 इसमें 100 से अधिक लोग रह सकते हैं और यहाँ से शहर का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है। ebs_alwar_0069 इसके ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए, इस किले को भारत सरकार द्वारा विरासत स्थल घोषित किया गया है। ebs_alwar_0071 इस भव्य होटल में आगंतुक प्रकृति की निकटता प्राप्त करने के लिए आ सकते हैं और यह नज़दीक से महसूस कर सकते हैं कि अतीत के राजघराने कैसे रहते थे। ebs_alwar_0072 पास में स्थित सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य घूमने के लिए एक सुन्दर जगह है। ebs_alwar_0074 यह माना जाता है कि किले का निर्माण यदुवंशियों (भगवान कृष्ण के वंशजों) ने करवाया था। ebs_alwar_0075 1775 में राजपूतों के हाथों में आने से पूर्व यह किला पहले मुगलों तथा उनके बाद जाटों के कब्ज़े में था। ebs_alwar_0076 राणावत ठाकुर भवानी सिंह के शासनकाल में इसे प्रमुख महत्व प्राप्त हुआ। ebs_alwar_0078 बैराठ (विरासत) ebs_alwar_0080 बैराठ का ऐतिहासिक क्षेत्र अशोकन शिलालेख, एक बौद्ध मठ तथा एक वृत्ताकार बौद्ध मंदिर के उत्खनित अवशेषों के लिए जाना जाता है, जो भारत में अपनी तरह के सबसे पहले ज्ञात मंदिरों में से एक है। ebs_alwar_0081 मुगल, राजपूत और मौर्य काल के अवशेष भी यहां पाए गए हैं। ebs_alwar_0082 प्राचीन काल में बैराठ को विराटनगर कहा जाता था और यह मत्स्य राजा विराट की तत्कालीन राजधानी थी। ebs_alwar_0083 किंवदंती है कि पांडवों ने अपने निर्वासन के दौरान यहां एक वर्ष बिताया था। ebs_alwar_0084 चीनी यात्री जुआनज़ैंग ने बैराठ को बौद्ध तीर्थयात्रा के लिए एक महान स्थान माना। ebs_alwar_0085 उत्खनन से यह भी पता चलता है कि यह स्थान कभी मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से पहली शताब्दी ईसवी के बीच एक बौद्ध केंद्र था। ebs_alwar_0086 यह बात यहाँ पाए गए उन दो शिलालेखों से यह सिद्ध होती है, जो माना जाता है कि उन 84,000 शिलालेखों और स्तंभ शिलालेखों में से एक हैं, जो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार और प्रचार के लिए अशोक के शासन के दौरान उत्कीर्णित किए गए थे। ebs_alwar_0087 यह शहर मुगल सम्राट अकबर के शासन के दौरान भी एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जिसने यहां सिक्कों की एक टकसाल स्थापित की थी। ebs_alwar_0089 यहाँ कैसे पहुंचे: ebs_alwar_0091 हवाई मार्ग से: अलवर से निकटतम हवाई अड्डा 163 किमी की दूरी पर स्थित दिल्ली हवाई अड्डा है। ebs_alwar_0093 रेल द्वारा: भारतीय रेलवे का तंत्र दिल्ली, जयपुर और भारत के विभिन्न अन्य शहरों जैसे महत्वपूर्ण शहरों को पर्यटन के लिए इस स्थान से जोड़ता है। ebs_alwar_0095 सड़क मार्ग द्वारा: सुव्यवस्थित सड़कें अलवर को दिल्ली, जयपुर और भारत के अन्य महत्वपूर्ण शहरों से सीधे जोड़ती हैं।