ID SENT ebs_ayodhya_0002 गंतव्य का नाम ebs_ayodhya_0004 अयोध्या ebs_ayodhya_0008 जहां पौराणिक कथाएं जीवंत हो उठती हैं ebs_ayodhya_0012 अक्टूबर से मध्य मार्च तक ebs_ayodhya_0016 उत्तर प्रदेश में स्थित अयोध्या हिन्दुओं के मध्य भगवान राम के जन्मस्थान के रूप में प्रतिष्ठित तथा लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। ebs_ayodhya_0020 उत्तर प्रदेश का अयोध्या नगर शांत सरयू नदी के किनारे स्थापित एवं हिंदू धर्म के सर्वाधिक पवित्र स्थलों में से एक है और पूरे वर्ष हजारों तीर्थयात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। ebs_ayodhya_0021 हिंदू महाकाव्य रामायण में वर्णित भगवान राम के जन्मस्थान के रूप में प्रतिष्ठित यह शहर मंदिरों से घिरा हुआ है, जिनमें से कुछ सरयू के घाटों पर स्थापित हैं। ebs_ayodhya_0022 दीपावली के दिन मनाए जाने वाले दीपोत्सव के दौरान यहाँ लाखों मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं, जिनकी आभा में अयोध्या शहर अत्यधिक सुन्दर एवं शानदार दिखाई देता है । ebs_ayodhya_0023 सरयू पर तैरते हुए दीपकों का नज़ारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। ebs_ayodhya_0024 यहाँ पर्यटन करने का सबसे अच्छा समय दीपावली पर्व के दौरान होता है जब मंदिर देदीप्यमान होते हैं और सड़कों पर उत्सव का सा माहौल होता है। ebs_ayodhya_0026 अयोध्या को चार जैन तीर्थंकरों अर्थात संतों की जन्मभूमि भी कहा जाता है और इस नगर तथा इसके आसपास के क्षेत्रों में उन सन्तों की स्मृति में अनेकों जैन मंदिर स्थापित हैं। ebs_ayodhya_0028 लखनऊ शहर से लगभग 135 किमी दूर स्थित अयोध्या ऐतिहासिक रूप से सूर्यवंश की राजधानी थी और प्राचीन काल में कौशलदेस के नाम से जानी जाती थी। ebs_ayodhya_0029 अवध के नवाब सआदत खान द्वारा इसके निकट स्थापित फैजाबाद नगर भी देखने योग्य है। ebs_ayodhya_0030 सुंदर किलों, मकबरों और मस्जिदों से आच्छादित यह नगर इतिहास की झलक प्रस्तुत करता है। ebs_ayodhya_0034 कनक भवन (आध्यात्मिक) ebs_ayodhya_0036 टीकमगढ़ (अब मध्य प्रदेश) की रानी ​​वृषभानु कुमारी द्वारा निर्मित कनक भवन का सुंदर मंदिर भगवान राम और उनकी पत्नी देवी सीता को समर्पित है। ebs_ayodhya_0037 राजस्थान और बुंदेलखंड क्षेत्र के भव्य महलों से आश्चर्यजनक समानता रखने वाले इस मंदिर को अक्सर ‘सोने-का-घर’ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ebs_ayodhya_0039 किंवदंती है कि यह मंदिर भगवान राम की सौतेली माँ, रानी कैकेयी द्वारा देवी सीता को तब उपहार में दिया गया था, जब भगवान राम से विवाह होने के बाद वे अयोध्या पहुंची थीं। ebs_ayodhya_0040 मंदिर के केंद्रीय हॉल में तीन तरफ मेहराबदार दरवाजे हैं और इसके गर्भगृह में भगवान राम और देवी सीता की सोने के मुकुट से सजी मूर्तियां स्थापित हैं। ebs_ayodhya_0041 मूर्तियों को सोने के वज़नदार आभूषणों के साथ खूबसूरती से सजाया गया है, चूंकि सोने का एक पर्यायवाची ‘कनक’ भी है, यही वजह है कि इस मंदिर को कनक भवन कहा जाता है। ebs_ayodhya_0042 इस मंदिर में सप्ताह के सभी दिनों में सुबह 8 बजे से 11.30 बजे और शाम 4.30 बजे से 9 बजे तक जाया जा सकता है। ebs_ayodhya_0044 नागेश्वरनाथ मंदिर आध्यात्मिक ebs_ayodhya_0046 राम-की-पैरी में स्थित नागेश्वरनाथ मंदिर अयोध्या का एक प्रमुख आकर्षण है। ebs_ayodhya_0047 यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका गर्भगृह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों (भगवान शिव का भक्तिमय रूप) में से एक है। ebs_ayodhya_0048 यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान राम के छोटे पुत्र, कुश ने किया था। ebs_ayodhya_0049 किंवदंती है कि जब सरयू नदी में नहाते समय कुश ने अपना कवच खो दिया था, तो वह एक नाग-कन्या को मिल गया, जिसे कुश से प्रेम हो गया। ebs_ayodhya_0050 कुश ने भगवन शिव की भक्त उस नाग-कन्या के लिए एक शिव मंदिर स्थापित किया, और यह वही मंदिर है। ebs_ayodhya_0051 1750 में नवाब सफदर जंग के एक मंत्री नवल राय द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। ebs_ayodhya_0052 मंदिर में जाने का सबसे अच्छा समय शिवरात्रि उत्सव के दौरान होता है, जिसे यहां बड़े धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है और सड़कों पर भगवान शिव की बारात भी निकाली जाती है। ebs_ayodhya_0054 हनुमान गढ़ी आध्यात्मिक ebs_ayodhya_0056 हनुमान गढ़ी मंदिर अयोध्या के सबसे लोकप्रिय आकर्षणों में से एक है और इसमें उनकी माँ अंजनी की गोद में बैठे भगवान हनुमान की एक सुंदर मूर्ति स्थापित है। ebs_ayodhya_0057 वर्ष भर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं द्वारा इस मंदिर का दौरा किया जाता है। ebs_ayodhya_0058 10वीं शताब्दी के इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आगंतुकों को 76 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। ebs_ayodhya_0059 किंवदंती है कि भगवान हनुमान भगवान राम की जन्मभूमि मानी जाने वाले रामकोट की रक्षा करने के लिए यहां एक गुफा में रुके थे। ebs_ayodhya_0060 इस भव्य मंदिर परिसर को चार-तरफा किले की तरह बनाया गया है और इसके प्रत्येक कोने को गोलाकार गढ़ों से सुसज्जित किया गया है। ebs_ayodhya_0061 यहाँ यह प्रचलित मान्यता है कि अयोध्या में राम मंदिर जाने वाले भक्तों को सबसे पहले हनुमान गढ़ी के दर्शन करने चाहिए और उसके बाद ही भगवान श्रीराम का आशीर्वाद लेना चाहिए। ebs_ayodhya_0063 गुलाब बाड़ी (यहाँ क्या करें) ebs_ayodhya_0065 फैजाबाद के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक, गुलाब बाड़ी एक आकर्षक हरे-भरे बगीचा है जिसमें 1753 से 1775 तक शासन करने वाले अवध के तीसरे नवाब शुजा-उद-दौला का शानदार मकबरा स्थित है। ebs_ayodhya_0066 पर्यटकों में प्रसिद्ध यह स्थान विभिन्न प्रकार के गुलाबों के लिए प्रसिद्ध है, जो देश के सभी हिस्सों से प्रकृति-प्रेमियों और वनस्पतिविदों को आकर्षित करते हैं। ebs_ayodhya_0067 गुलाब बाड़ी का उपयोग नवाब के शासनकाल के दौरान महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यों की मेजबानी करने के लिए किया जाता था। ebs_ayodhya_0068 अपनी वास्तुकला में इस्लामी शैली का स्पष्ट प्रभाव प्रदर्शित करता यह भव्य मकबरा उत्तर प्रदेश में सबसे सुन्दर स्मारकों में से एक है। ebs_ayodhya_0069 जैसे ही आप इस बगीचे में प्रवेश करते हैं, भारत के राष्ट्रीय प्रतीक से उत्कीर्णित एक बड़ा स्तंभ आपका स्वागत करता है। ebs_ayodhya_0070 दोनों ओर से नारियल के पेड़ों से घिरे हुए एक सुव्यवस्थित गलियारे से होकर आप एक प्राचीन धनुषाकार प्रवेश द्वार की ओर पहुँचते हैं। ebs_ayodhya_0071 गुलाब के बगीचे में प्रवेश करने के लिए, आपको इस भव्य प्रवेश द्वार से गुजरना होता है। ebs_ayodhya_0072 इस बगीचे में एक सुंदर मस्जिद भी है और उस मस्जिद के ठीक बगल में एक छोटी सी चौकी है। ebs_ayodhya_0073 मकबरे के मेहराबदार मार्गों से गुजरना एक आकर्षक अनुभव प्रदान करता है। ebs_ayodhya_0075 त्रेता-के-ठाकुर (आध्यात्मिक, विरासत) ebs_ayodhya_0077 अयोध्या का एक लोकप्रिय आकर्षण त्रेता-के-ठाकुर मंदिर है जो भगवान राम को समर्पित है, हिंदू धर्म के अनुसार मानव जाति के चार युगों में से दूसरे युग त्रेता में अवतरित हुए श्रीराम को भगवान के रूप में जाना व माना जाता है । ebs_ayodhya_0078 अयोध्या के नया घाट पर स्थित यह मंदिर 300 साल पहले कुल्लू के राजा द्वारा बनाया गया था और काफी धार्मिक महत्व रखने के साथ ही बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है। ebs_ayodhya_0079 किंवदंती है कि भगवान राम ने रावण नमक राक्षस पर अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए यहाँ अश्वमेध यज्ञ का संचालन किया था। ebs_ayodhya_0081 इस मंदिर में भगवान राम, देवी सीता, भगवान लक्ष्मण, भगवान हनुमान और पवित्र रामायण में वर्णित अनेक अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। ebs_ayodhya_0082 इन मूर्तियों को काले पत्थर के एक ही खंड से उकेरा गया है। ebs_ayodhya_0083 इस मंदिर में जाने का सबसे अच्छा समय हिन्दू पंचांग के कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर) के दौरान होता है, जब मास के ग्यारहवें दिन अर्थात एकादशी को यहाँ भक्तों का बड़ा जनसमूह एकत्रित होता है। ebs_ayodhya_0085 तुलसी स्मारक भवन (आध्यात्मिक) ebs_ayodhya_0087 अवधी भाषा में रामचरितमानस और हनुमान चालीसा की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास की स्मृति में निर्मित तुलसी स्मारक भवन में अयोध्या शोध संस्थान स्थित है। ebs_ayodhya_0088 यह एक ऐसा संगठन है जो अयोध्या शहर की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक परंपरा का अध्ययन और वर्णन करता है। ebs_ayodhya_0089 इस भवन में रामायण कला और शिल्प पर आधारित स्थाई प्रदर्शनी और एक पुस्तकालय भी है। ebs_ayodhya_0090 यहाँ रामलीला का दैनिक आयोजन और रामकथा का नियमित पाठ भी होता है। ebs_ayodhya_0091 तुलसी स्मारक भवन में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों व प्रार्थना सभाओं के साथ-साथ अनुभवी कलाकारों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक नाटकों का आयोजन किया जाता है। ebs_ayodhya_0092 इस संस्थान के भीतर सन 1988 में रामकंठ संग्रहालय स्थापित किया गया था जिसमें भगवान राम के युग की प्राचीन वस्तुओं के संग्रह के माध्यम से इस नगर के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सामने लाया जाता है। ebs_ayodhya_0094 फैजाबाद (विरासत) ebs_ayodhya_0096 घाघरा नदी के तट पर स्थित, फ़ैज़ाबाद अवध के नवाबों के ऐतिहासिक अतीत से सम्बद्ध है और अयोध्या के निकट एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है। ebs_ayodhya_0097 अवध के दूसरे नवाब सआदत खान ( 1722 से 1739) द्वारा स्थापित फ़ैज़ाबाद नगर सुंदर किलों, मकबरों और मस्जिदों के लिए मशहूर है। ebs_ayodhya_0098 यहाँ आप छोटा कलकत्ता के नाम से प्रसिद्ध फोर्ट कलकत्ता से अपनी पर्यटन यात्रा शुरू करें। ebs_ayodhya_0099 बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों द्वारा पराजित होने के बावजूद अवध के नवाब शुजा-उद-दौला (1754-1775) द्वारा 1764 में निर्मित इस किले के निर्माण ने संकेत दे दिया था कि जंग हारने के बावजूद इस क्षेत्र पर नवाब का कब्ज़ा बरक़रार था। ebs_ayodhya_0100 इस किले में नवाब और उनकी बेगम ने अपनी मृत्यु तक निवास किया। ebs_ayodhya_0101 मुगल शैली की वास्तुकला की में निर्मित इस किले की दीवारें स्थानीय मिट्टी से बनी हैं। ebs_ayodhya_0102 हालांकि किले का अधिकांश हिस्सा आज खंडहर की स्थिति में है। ebs_ayodhya_0103 पर्यटक नवाब शुजा-उद-दौला के शानदार मकबरे वाले गुलाबों के बाग़ ‘गुलाब बाड़ी’ में भी जा सकते हैं। ebs_ayodhya_0104 यह अपने विभिन्न प्रकार के गुलाबों के लिए प्रसिद्ध है, जो देश के सभी हिस्सों से प्रकृति प्रेमियों और वनस्पतिविदों को आकर्षित करता है। ebs_ayodhya_0105 गुलाब बाड़ी का उपयोग नवाब के शासनकाल के दौरान महत्वपूर्ण मज़हबी आयोजनों की मेजबानी करने के लिए किया जाता था। ebs_ayodhya_0107 इस्लामी शैली की वास्तुकला में निर्मित यह भव्य मकबरा उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक सुन्दरतापूर्वक निर्मित किए गए स्मारकों में से एक है। ebs_ayodhya_0108 जैसे ही आप बगीचे में प्रवेश करते हैं, भारत के राष्ट्रीय प्रतीक से उत्कीर्णित एक बड़ा स्तंभ आपका स्वागत करता है। ebs_ayodhya_0109 एक सुव्यवस्थित गलियारे से गुज़रते हुए, जिसके दोनों ओर नारियल के पेड़ आच्छादित हैं, आप प्राचीन धनुषाकार प्रवेश द्वार की ओर पहुँचते हैं। ebs_ayodhya_0111 बगीचे में एक सुंदर मस्जिद भी है निर्मित और इस मस्जिद के ठीक बगल में एक छोटी सी चौकी है। ebs_ayodhya_0112 मकबरे के मेहराबदार मार्गों से गुजरना एक अद्भुत अनुभव प्रदान करता है। ebs_ayodhya_0114 शुजा-उद-दौला की पत्नी बहू बेगम द्वारा निवास स्थल हेतु प्रयोग किया जाने वाला भव्य मोती महल भी देखने लायक है। ebs_ayodhya_0115 ताड़ के वृक्षों से सुसज्जित एक सुव्यवस्थित उद्यान से घिरा यह महल मुगल वास्तुकला के बेहतरीन नमूने के रूप में स्थापित है और फैजाबाद के राजसी अतीत का परिचय देता है। ebs_ayodhya_0116 बहू बेगम का मकबरा जवाहरबाग में बना हुआ है और उसे अवध की सबसे अच्छी इमारतों में से एक माना जाता है। ebs_ayodhya_0117 उस समय इसके निर्माण में लगभग तीन लाख रुपये की लागत आई थी। ebs_ayodhya_0119 पर्यटक चक्र हरजी विष्णु मंदिर भी जा सकते हैं, जो भगवान राम के चरणों के चिह्नों के लिए प्रसिद्ध है, इसके अतिरिक्त वे फैजाबाद के एक और प्रसिद्ध मंदिर ‘राजा मंदिर’ के भी दर्शन कर सकते हैं। ebs_ayodhya_0121 गोरखपुर (आध्यात्मिक) ebs_ayodhya_0123 आध्यात्मिकता और इतिहास के रस में डूबा हुआ गोरखपुर अपने वजूद में एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत समेटे हुए है। ebs_ayodhya_0124 अयोध्या से लगभग 13 घंटे की दूरी पर स्थित यह शहर संत गोरक्षनाथ के मंदिर के लिए जाना जाता है, जिन्होंने यहां तपस्या की थी और जिनके नाम से प्रेरणा लेकर इस शहर का नाम रखा गया। ebs_ayodhya_0125 गोरखपुर के आसपास कई आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक और प्राकृतिक स्थल हैं जिनका नाम संत गोरखनाथ के नाम पर ही रखा गया है। ebs_ayodhya_0126 यह शहर अनेकों मंदिरों का गढ़ है, जिनमें से सबसे प्रमुख आरोग्य मंदिर है जो प्राकृतिक चिकित्सा का केन्द्र है। ebs_ayodhya_0127 पर्यटक गोरखपुर मंदिर और रामगढ़ ताल नामक 700 हेक्टेयर में फैली एक शांत झील का भी अवलोकन कर सकते हैं। ebs_ayodhya_0128 आगंतुक सल और सेकोइया पेड़ों के घने एवं विस्तृत जंगल कुशमी वन में भी जा सकते हैं। ebs_ayodhya_0129 यहाँ का एक और उल्लेखनीय स्थान वीर बहादुर सिंह तारामंडल है। ebs_ayodhya_0130 साथ ही यह शहर भगवद गीता का प्रकाशन करने वाले गोरखपुर प्रेस के लिए भी प्रसिद्ध है। ebs_ayodhya_0132 लखनऊ से लगभग 250 किमी दूर स्थित गोरखपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है। ebs_ayodhya_0133 यह पहले मौर्य, कुषाण, शुंग और गुप्त साम्राज्यों का एक हिस्सा था। ebs_ayodhya_0135 रामकोट (आध्यात्मिक) ebs_ayodhya_0137 एक पहाड़ी के ऊपर स्थित रामकोट मंदिर अयोध्या में एक प्रमुख पूजा स्थान है। ebs_ayodhya_0138 लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार एक पहाड़ी पर स्थापित यह प्राचीन मंदिर भगवान राम के किले की जगह पर बना हुआ है। ebs_ayodhya_0139 इस मंदिर में साल भर हजारों भक्त आते हैं लेकिन दर्शन करने का सबसे अच्छा समय हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने (मार्च-अप्रैल) के दौरान होता है जब भगवान रामनवमी की जयंती बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है। ebs_ayodhya_0140 इस मंदिर में भगवान राम के सम्मान में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो एक मनोरम अनुभव होता है। ebs_ayodhya_0141 इस मंदिर से पूरे शहर के व्यापक दृश्य को देखा जा सकता है, जिसमें इसके अद्भुत मंदिरों और सुंदर घाटों की आकर्षक छटा प्राप्त होती है। ebs_ayodhya_0142 किंवदंती है कि इस किले की सुरक्षा महाबली हनुमान एक गुप्त गुफा से किया करते थे। ebs_ayodhya_0143 यह मंदिर सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है। ebs_ayodhya_0144 यात्रा का समय सुबह 7 बजे से 11 बजे तथा दोपहर 2 से शाम 6 बजे तक है। ebs_ayodhya_0146 गुप्तार घाट (आध्यात्मिक) ebs_ayodhya_0148 सरयू नदी के तट पर स्थित, गुप्तार घाट का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। ebs_ayodhya_0149 'पौराणिक कथा के अनुसार, यही वह जगह थी जहाँ भगवान राम ने पृथ्वी को त्यागने और अपने मूल निवास ''वैकुण्ठ'' में वापस जाने के लिए अपनी जल समाधि ली थी ।' ebs_ayodhya_0150 भक्तों के बीच यह मान्यता है कि इस घाट पर सरयू नदी में डुबकी लगाने से उनके पाप धुल जाते हैं और उन्हें सांसारिक चिंताओं से मुक्ति प्राप्त होती है। ebs_ayodhya_0151 यह घाट भगवान राम के नाम के मंत्रों से सदैव गूंजता रहता है और यहाँ भक्तजन और पुजारी उनकी प्रशंसा में भजन गाते हैं। ebs_ayodhya_0152 पर्यटक गुप्तार घाट के पास स्थित राजा मंदिर और चक्र हरजी विष्णु मंदिर भी जा सकते हैं, इस घाट पर राम जानकी, चरण पादुका, नरसिंह और हनुमानजी के प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित हैं। ebs_ayodhya_0153 इन सुव्यवस्थित घाटों का निर्माण राजा दर्शन सिंह ने 19 वीं शताब्दी के पहले भाग के दौरान करवाया था। ebs_ayodhya_0155 पाटन देवी (आध्यात्मिक) ebs_ayodhya_0157 अयोध्या के बाहरी इलाके में स्थित सिद्धपीठ पाटन देवी उन 51 शक्तिपीठों में से एक है जहाँ देवी सती के शरीर के अलग-अलग हिस्से गिरे थे, यह स्थान अत्यधिक धार्मिक महत्व रखता है। ebs_ayodhya_0158 पौराणिक कथा के अनुसार, यह वही स्थान है जहां सती का दाहिना कंधा गिरा था। ebs_ayodhya_0159 इस मंदिर का सम्बन्ध महाभारत कालीन महायोद्धा कर्ण से भी है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने इस मंदिर के ठीक बगल में स्थित सूर्य कुंड का निर्माण किया था। ebs_ayodhya_0160 इस मंदिर का पुनः नए सिरे से राजा विक्रमादित्य द्वारा निर्मित करवाया गया था, और बाद में इसे 11वीं सदी में श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव द्वारा पुनर्निर्मित किया गया था। ebs_ayodhya_0161 इस मंदिर में पाटन देवी के साथ माँ कालिके, काल भैरव और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। ebs_ayodhya_0162 यह मंदिर तुलसीपुर से चौधरीडीह की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित है। ebs_ayodhya_0164 प्रभोसा (आध्यात्मिक, विरासत) ebs_ayodhya_0166 कौशाम्बी में स्थित प्रभोसा की पहाड़ी भारत में बौद्धों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। ebs_ayodhya_0167 ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध अपने छठे वस्सा अनुष्ठान, जिसके अंतर्गत बौद्ध भिक्षु तीन महीने की अवधि तक मौन रहते थे और यात्रा नहीं करते थे, के दौरान यहीं पर रुके थे। ebs_ayodhya_0168 इस पहाड़ी को प्राचीन काल में मांकुला के नाम से भी जाना जाता था और चीनी यात्री ज़ुआंगज़ंग के यात्रा संस्मरणों में इसका उल्लेख मिलता है , जिन्होंने 7वीं सदी में इस स्थान की यात्रा की थी और यहाँ सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एक स्तूप की खोज की थी। ebs_ayodhya_0169 इस पहाड़ी के चट्टानी इलाक़े में अनेकों गुफाएँ स्थित हैं और उनमें से सबसे बड़ी सीता की खिड़की है। ebs_ayodhya_0170 इतिहासकारों का मानना है कि यह वही स्थान हो सकता है जहां भगवन बुद्ध अपनी प्रभोसा यात्रा के दौरान रुके थे। ebs_ayodhya_0171 इस पहाड़ी की चोटी से पर्यटकों को यमुना नदी और मंदिरों की नगरी प्रभोसा का भव्य रूप देखने को मिलता है। ebs_ayodhya_0173 वैशाली (विरासत) ebs_ayodhya_0175 दुनिया में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए सर्वप्रथम गणतंत्र के रूप में प्रतिष्ठित वैशाली एक पुरातात्विक स्थल है, जिसका कालखंड 500 ईसा पूर्व से प्रारंभ होकर चार भागों में विभाजित होकर लगभग एक हजार साल का है, और इस बात के साक्ष्य यहाँ प्राप्त होने वाली टेराकोटा की वस्तुओं, सिक्कों, मुहरों, मंदिरों और स्तूपों से प्राप्त होते हैं। ebs_ayodhya_0176 वैशाली में सबसे महत्वपूर्ण पर्यटक आकर्षण कोल्हुआ है, जहां एक विशाल लोहे का स्तंभ स्थापित है, माना जाता है कि इसका निर्माण मौर्य वंश के सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था। ebs_ayodhya_0177 इंटों से बने एक स्तूप के ठीक बगल में स्थित इस स्तंभ का निर्माण भगवान बुद्ध के अंतिम उपदेश की स्मृति में किया गया था। ebs_ayodhya_0178 कहा जाता है कि जहाँ आज इस मठ के खंडहर स्थित हैं, कभी वहाँ भगवान बुद्ध निवास किया करते थे। ebs_ayodhya_0179 पर्यटक वैशाली संग्रहालय में भी जा सकते हैं, जो इतिहास एवं पुरातत्व में रूचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है। ebs_ayodhya_0180 इस संग्रहालय में उन उत्खनित वस्तुओं की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की गई है जिन्हें वैशाली के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों पर खोजा गया था। ebs_ayodhya_0181 इस संग्रहालय के ठीक बगल में, एक गोलाकार टिन शेड के नीचे उस स्तूप के अवशेष स्थित हैं, जहाँ मान्यताओं के अनुसार एक बार भगवान बुद्ध के पार्थिव शरीर की भस्म को रखा गया था। ebs_ayodhya_0182 अभिषेक पुष्करणी के नाम से विख्यात लिच्छवी शासकों का अभिषेक सरोवर इस संग्रहालय के पास स्थित एक प्रमुख आकर्षण है। ebs_ayodhya_0184 वैशाली लिच्छवी वंश (400 से 750 CE) की राजधानी थी, और यद्यपि पाटलिपुत्र (पटना) मौर्य और गुप्त राजवंशों का केन्द्र था, इसके बावजूद वाणिज्य और उद्योग यहाँ कहीं अधिक प्रबलता से विकसित हुए। ebs_ayodhya_0186 इसके नज़दीक एक और लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण बावन पोखर मंदिर है, जो पाल काल (8 वीं से 12 वीं शताब्दी) से सम्बद्ध है। ebs_ayodhya_0187 बावन पोखर सरोवर के उत्तरी किनारे पर स्थित यह मंदिर विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं की छवियों से सुसज्जित-सुशोभित है। ebs_ayodhya_0188 अपनी यात्रा का समापन दुनिया के सबसे ऊंचे स्तंभों में से एक, विश्व शांति स्तूप या शांति स्तंभ को देख कर करें, जिसका निर्माण जापानी सरकार के समर्थन से भारत सरकार द्वारा करवाया गया है। ebs_ayodhya_0191 कुशीनगर (भ्रमण) ebs_ayodhya_0193 इस प्राचीन शहर को अपना नाम भगवान राम के पुत्र कुश से मिला है, जिन्हें इसका संस्थापक शासक कहा जाता है। ebs_ayodhya_0194 कुशीनगर भारत के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है। ebs_ayodhya_0195 कुशीनगर में प्रमुख पर्यटक आकर्षण प्राचीन महापरिनिर्वाण मंदिर है, जो बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। ebs_ayodhya_0196 मंदिर में भगवान बुद्ध की 6 मीटर लंबी मूर्ति है जिसमें वे दाहिनी ओर टेक लेकर लेटे हुए हैं। ebs_ayodhya_0197 ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने यहाँ मोक्ष की सर्वोच्च स्थिति प्राप्त की थी। ebs_ayodhya_0198 महापरिनिर्वाण मंदिर के दर्शन करने के बाद कुशीनगर संग्रहालय जाकर इस शहर के इतिहास के बारे में गहरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। ebs_ayodhya_0199 1992 में स्थापित इस संग्रहालय में ऐसी कई पुरातात्विक उत्खनित वस्तुएँ मौजूद हैं जो कुशीनगर में खोजी गई थीं। ebs_ayodhya_0200 इनमें मूर्तियां, मुहरें, सिक्के, बैनर, पुरावशेष और मूर्तियाँ शामिल हैं। ebs_ayodhya_0201 इस संग्रहालय की सबसे खास विशेषता गंधार शैली में निर्मित भगवान बुद्ध की आदमकद मूर्ति है। ebs_ayodhya_0202 यहाँ से निकल कर पर्यटक रामभर स्तूप का दौरा कर सकते हैं, जो उस स्थान को चिह्नित करता है जहां भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। ebs_ayodhya_0203 ताड़ के वृक्षों से सुसज्जित एक बगीचे के निकट स्थित यह स्तूप लगभग 50 फीट लंबा है। ebs_ayodhya_0204 यहाँ का एक अन्य उल्लेखनीय स्थल सूर्य मंदिर है जिसका निर्माण गुप्त काल (319 ईसवी से 550 ईसवी के दौरान किया गया था, यहाँ बेशकीमती नीलम को गढ़ कर बनाई गई सूर्य देव की एक सुंदर मूर्ति है। ebs_ayodhya_0205 कुशीनगर अयोध्या से 188 किमी की दूरी पर स्थित है और यहाँ देश के सभी हिस्सों से आसानी से पहुँचा जा सकता है। ebs_ayodhya_0207 कपिलवस्तु (भ्रमण) ebs_ayodhya_0209 ऐसा कहा जाता है कि कपिलवस्तु नाम के इस महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थल पर भगवान बुद्ध के पिता शुद्धोधन का शासन था। ebs_ayodhya_0210 अपने जीवन के प्रारंभ में राजकुमार गौतम के नाम से प्रसिद्ध भगवान बुद्ध 29 साल की उम्र में इस महल को छोड़ कर ज्ञान प्राप्त करने के लिए निकल गए, और 12 वर्ष बाद ज्ञान प्राप्त कर के ही लौटे। ebs_ayodhya_0211 यहाँ भ्रमण करने के लिए सबसे अच्छा समय तब होता है जब प्रत्येक वर्ष 29 दिसंबर से 31 दिसंबर तक यहाँ भव्य कपिलवस्तु बुद्ध महोत्सव आयोजित किया जाता है। ebs_ayodhya_0212 यहाँ का सबसे लोकप्रिय आकर्षण मुख्य स्तूप का पुरातात्विक स्थल है जिसे सत्तर के दशक में किए गए उत्खनन के दौरान खोजा गया था। ebs_ayodhya_0213 इस उत्खनन में कई मुहरों और अन्य ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण सामग्रियों की भी खोज की गई थी। ebs_ayodhya_0214 कहा जाता है कि इस स्तूप का पुनर्निर्माण कुषाण शासक कनिष्क ने किया था, जो बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे। ebs_ayodhya_0215 पर्यटक राजा शुद्धोधन के महल के खंडहरों की भी यात्रा कर सकते हैं, जिन्हें उत्खनन के दौरान खोजा गया था। ebs_ayodhya_0216 कपिलवस्तु अयोध्या से 210 किमी की दूरी पर स्थित है और पर्यटन के लिए एक बेहतरीन जगह है। ebs_ayodhya_0218 श्रावस्ती (भ्रमण) ebs_ayodhya_0220 प्राचीन शहर श्रावस्ती बौद्धों का एक प्रमुख तीर्थस्थल है और भारत के साथ ही थाईलैंड, जापान, चीन और श्रीलंका जैसे देशों से बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता रहा है। ebs_ayodhya_0221 राप्ती नदी के किनारे स्थित यह शहर कभी बुद्ध के एक शिष्य, राजा पसेनदी द्वारा शासित कोसल राज्य की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था । ebs_ayodhya_0222 इस प्राचीन शहर में सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण चमत्कारी स्तूप है, जहां कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना समय बिताया था। ebs_ayodhya_0223 उनके उपदेशों और शिक्षाओं ने श्रावस्ती को बौद्ध शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया। ebs_ayodhya_0224 भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के स्मरण में उस स्थान पर एक स्तूप का निर्माण किया गया था। ebs_ayodhya_0225 उस प्राचीन स्तूप के खंडहर 2004 में निर्मित नए स्तूप के ठीक बगल में स्थित हैं। ebs_ayodhya_0226 यहाँ के अन्य पर्यटक स्थलों में अनाथपिंडिका का स्तूप, अंगुलिमाल का स्तूप और प्राचीन जैन तीर्थंकर मंदिर शामिल हैं। ebs_ayodhya_0227 अंगुलिमाल स्तूप के अवशेष को पक्की कुटी के नाम से जाना जाता है । ebs_ayodhya_0228 यह श्रावस्ती के महेट क्षेत्र में पाए जाने वाले सबसे बड़े टीलों में से एक है। ebs_ayodhya_0229 यह सीढ़ीदार स्तूप एक आयताकार मैदान पर निर्मित है और कहा जाता है कि इसे भगवान बुद्ध के सम्मान में राजा प्रसेनजित ने बनवाया था। ebs_ayodhya_0230 पर्यटक अनाथपिंडिका स्तूप के खंडहर के पास स्थित कच्ची कुटी भी जा सकते हैं। ebs_ayodhya_0231 श्रावस्ती के सबसे महत्वपूर्ण उत्खनन में स्थलों में से एक, यह स्थल दूसरी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी के मध्य की विभिन्न अवधियों से संबंधित संरचनात्मक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। ebs_ayodhya_0232 श्रावस्ती अयोध्या से 107 किमी की दूरी पर स्थित है और एक दर्शनीय स्थान है। ebs_ayodhya_0234 सूचीबद्ध आलेख ebs_ayodhya_0236 व्यंजन एवं भोजन ebs_ayodhya_0238 मसालेदार स्वादिष्ट चाट से लेकर मीठे और पौष्टिक लड्डुओं तक, अयोध्या में सरल और स्वादिष्ट की भरमार है। ebs_ayodhya_0240 विभिन्न व्यंजन ebs_ayodhya_0242 चाट ebs_ayodhya_0244 अयोध्या में मसालेदार, कुरकुरी, तीखी और खट्टी-मीठी चाट का स्वाद लिया जा सकता है। ebs_ayodhya_0245 इन व्यंजनों में इमली के पानी के साथ परोसी जाने वाली कुरकुरी तली हुई पूरियां हैं जो पानी पूरी के नाम से मशहूर हैं; तली हुई और मसालेदार कचौरियां हैं; आलू की टिक्कियाँ हैं जिन्हें उबले आलू, मटर और विभिन्न मसालों से तैयार किया जाता है; दही, इमली और सेव के साथ कुरकुरी तली हुई पापड़ी से बनी पापड़ी चाट है; तथा चटनी के साथ खाया जाने वाले समोसे भी हैं। ebs_ayodhya_0247 कचौरी ebs_ayodhya_0249 इस स्वादिष्ट व्यंजन को बनाने के लिए मैदे से बने चपटे गोले को दाल, बेसन, काली मिर्च, लाल मिर्च पाउडर, नमक और अन्य मसालों को पीली मूंग या उरद के पके हुए मिश्रण के साथ भरा जाता है। ebs_ayodhya_0251 लड्डू ebs_ayodhya_0253 धार्मिक या उत्सव के अवसरों पर बाँटे और खाए जाने वाले लड्डू आटे और चीनी से बनी गोलाकार मिठाइयाँ होती हैं। ebs_ayodhya_0255 उत्तर भारतीय खाना ebs_ayodhya_0257 स्वादिष्ट उत्तर भारतीय थालियों को अयोध्या में कई लज़ीज़ व्यंजनों के साथ परोसा जाता है। ebs_ayodhya_0258 इन व्यंजनों में चावल, रोटियां और कई प्रकार के उप-व्यंजन शामिल हैं। ebs_ayodhya_0260 यहाँ कैसे पहुंचे ebs_ayodhya_0262 हवाईजहाज द्वारा ebs_ayodhya_0265 अयोध्या पहुँचने के लिए निकटतम हवाई पट्टियाँ लखनऊ इलाहाबाद या वाराणसी के हवाई अड्डे हैं। ebs_ayodhya_0267 रेलमार्ग द्वारा ebs_ayodhya_0269 अयोध्या शहर मुगल सराय-लखनऊ मुख्य मार्ग पर उत्तर रेलवे के ब्रॉड गेज रेलमार्ग पर स्थित है। ebs_ayodhya_0273 अनेक सुव्यवस्थित व मज़बूत सड़कें अयोध्या नगर को आसपास के शहरों और कस्बों से जोड़ती हैं।